मैं और मेरे अह्सास
मेहरबान
मेहरबान होके बुला लो दौड़ा चला आऊँगा l
एक बार आया तो मुड़के वापिस ना जाऊँगा ll
इशारो से मिलने की हामी भर दी है तो आज l
साथ अपने क़ायनात की खुशियाँ लाउँगा ll
कई दिनों के बाद फ़िज़ाओं में बहार आई कि l
चहेरे पर रोनक देखकर सुकून सा पाउँगा ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह