Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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मुक्तक
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दोहा मुक्तक
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जैसे जिसके कर्म हैं, वैसा ही परिणाम।
व्यर्थ आप हैरान हैं, नाम हुआ बदनाम।।
कहाँ किसी की बात का, देते आप महत्व-
फिर दुबले क्यों हो रहे, टकराओ नित जाम।।

मोह आप मत कीजिए, मानो मेरी बात।
बड़े कष्ट में आपकी, कट पायेगी रात।
कहें मित्र यमराज भी, कर लो सोच-विचार-
इस चक्कर में कल कहीं, मिले मुफ्त में लात।।

रिश्ता था कोई नहीं, फिर भी इतना मोह।
डर भी लगता था बहुत, पीड़ा बने विछोह।
मम प्रियवर यमराज भी, देते मुझको ज्ञान-
मर्यादित रहना सदा, तजकर ऊहा पोह।।

कुछ तिलचट्टे चाटते, घूम-घूमकर देश।
जाने कैसा है मिला, कुत्सित सा परिवेश।।
भाव नीच नित ये रखें, करते भ्रष्टाचार -
यहाँ-वहाँ यों नाचते, खोले डायन केश।।

तिलचट्टों के झुंड पर, व्यर्थ आपका वार।
कोशिश अपनी क्यों भला, हम करते बेकार।।
सृष्टि प्रलय भी मारकर, पाती नहीं सुकून-
सहनशक्ति इनकी सदा, होती बड़ी अपार।।

मानव जीवन है मिला, इसे दीजिए मान।
कुत्सित होती भावना, करो अभी बलिदान।।
आग वासना की जले, उसे रोक लो मित्र-
वरना जलेंगे आप भी, यही मुफ्त का ज्ञान।।
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रोला मुक्तक
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कितना भी मतभेद, नहीं कीजिए लड़ाई।
और आपके बीच, सदा हो व्यर्थ बड़ाई।।
कहें मित्र यमराज, होश में रहिए सारे-
सबके हित की बात, एकता केवल भाई।।
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चौपाई मुक्तक
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पहले जैसा प्यार नहीं है।
मान रहे तकरार सही है।
जाने खुद को समझ रहे क्या -
घर का खाता सही नहीं है।।

कल के जैसी बात नहीं है।
हमें किसी से प्यार नहीं है।
सभी स्वार्थ में इतना डूबे-
पहले जैसा प्यार नहीं है।।
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बेटियाँ माता-पिता की जान होती हैं।
उनका मान सम्मान स्वाभिमान होती हैं।
जानें क्यों नहीं समझता है ये समाज-
इनको रुलाने से जान ही बेजान होती है।।

परंपरा की आड़ में हम परंपरा निभाते हैं।
नाहक बदनाम हैं कि हम परंपरा चलाते हैं।
कुछ भी कहते रहिए आप हमें चाहे जितना -
हम तो अब परंपरा खाते और खिलाते हैं।।

भूखे प्यासे को भोजन पानी दीजिए।
मज़ा नहीं आ रहा है तो कर्ज लीजिए।
कुछ नहीं रखा अब सूकून से जीनें में -
भेष बदलिए और कत्लेआम कीजिए।।

आँसू उसके पोंछकर क्या पा गए।
भूखे थे क्या पेट तेरे भर गए।
इसका पीछे राज क्या है, मित्रवर-
या तुम्हारे हम सभी दुश्मन हुए।।

सबसे प्यारा मित्र आज यमराज है।
दुनिया कहती यही कोढ़ में खाज है।
इसके पीछे राज भला तुम क्या जानो-
चमक रहा यमराज मित्र का ताज है।।

प्रेम सद्भावना हम पढ़ाते रहे।
गीत मीठे मधुर हम सुनाते रहे।
कर्म पथ पर अडिग मैं रहूँ उम्र भर-
कामना आप सब मुस्कराते रहें।।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112026473
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