Hindi Quote in Poem by Jatin Tyagi

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वीरत्व की वह ज्वाला थे, वह भारत की पहचान,
जिनके साहस के आगे झुकता था हर तूफ़ान।
कालापानी की काली रातें हार गईं एक दिन,
जब “सावरकर” नाम बना आज़ादी का अभिनंदन।।

लोहे की उन सलाखों में भी स्वाभिमान जगा था,
हर पीड़ा के पीछे केवल भारत माँ का ध्येय रहा था।
तन घायल था, मन अडिग था, दृष्टि रही विशाल,
वीर सावरकर के चरणों में झुकता है यह काल।।


कलम उठी तो क्रांति बनी, शब्द बने अंगार,
सोई हुई पीढ़ी को दी फिर से नई पुकार।
बंधन तोड़ो, जागो, बढ़ो — उनका यही संदेश,
राष्ट्रधर्म से बढ़कर जग में नहीं कोई परिवेश।।


अंडमान की उन दीवारों ने इतिहास सुनाया है,
कैसे एक अकेले वीर ने साम्राज्य हिलाया है।
हर कोड़े की चोटों में भी वंदेमातरम् गूँजा,
भारत माँ के चरणों में उनका जीवन पूरा।।


वह केवल एक व्यक्ति नहीं, युग का प्रखर विचार,
त्याग, तपस्या और साहस का अमिट दिव्य विस्तार।
उनकी गाथा सुनते ही रक्त स्वयं उबल जाता,
हर युवा के भीतर सोया सिंह पुनः जग जाता।।


आज 143वीं जयंती पर शत-शत नमन तुम्हें,
हे वीर सावरकर! भारत का अर्पण समर्पण तुम्हें।
तेरे आदर्शों की ज्योति हर दिल में जलती रहे,
भारत माँ की जय ध्वनि सदियों तक चलती रहे।।


“राष्ट्रदीप जतिन त्यागी” का श्रद्धा सहित प्रणाम,
तेरी अमर तपस्या को बारम्बार प्रणाम।
जब तक गंगा बहती होगी, जब तक रहेगा प्राण,
भारतवर्ष सुनाएगा तेरा अमर बलिदान।।

- जतिन त्यागी

Hindi Poem by Jatin Tyagi : 112026087
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