“साधारण सी स्त्री”
तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा…
मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं।
ना मैं सती, ना उर्वशी,
मैं एक साधारण सी स्त्री, बावली बहुत हूँ मैं।
तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा।
मैं अट्ट स्वाभिमानी, बहुत बोलने वाली,
अगर रूठ जाऊँ तो घंटों चुप रहने वाली।
छोटी-छोटी बातों पर खिन्न हो जाने वाली,
बेवजह हँसने वाली, बेहिसाब रोने वाली,
बहुत ज़्यादा सोचने वाली…
तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा…
मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं।
अगर चरित्र पर बात आ जाए तो
आक्रामक बहुत हूँ मैं,
खुद के लिए मशाल
और खुद में क्रांति बहुत हूँ मैं।
तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा…
मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं।
स्वाभिमान मेरी प्रथम धरोहर,
उसकी रक्षा ही मेरा श्रृंगार है।
मैं झुकूँ प्रेम में सौ बार मगर,
अपमान पर मौन रहना अस्वीकार है।
मैं कोमल हूँ, पर दुर्बल बिल्कुल नहीं,
अपने सम्मान की प्रहरी हर बार हूँ मैं।
हाँ, एक साधारण सी स्त्री हूँ मैं,
पर स्वाभिमान से ही साकार हूँ मैं।