घर से तो सही पता लेकर चला था
राह ए मंजिल भटक चुका हूँ किसकी बद्दुआ लेकर चला था
रास्ते की धुंध तनहा तो नहीं
ये सोचकर मुठ्ठी में थोड़ा धुआँ लेकर चला था
बोल उठे मील के पत्थर तक
एक मैं ही था खामोश जुबां लेकर चला था
मुझे पागल समझें कश्तियां समन्दर की
अपनी जेब में तुफां लेकर चला था
मुझें चिढ़ाया है रास्ते के अंधेरों ने
बुझा हुआ चिराग लेकर चला था
मैं जा रहा हूँ किधर कोई बतलाता नहीं
अब रास्ता ही बतायेगा ये मुझे कहाँ लेकर चला था