यह मेरे शब्द नहीं, मेरी ख़ामोशी की गवाही है।
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– ख़ुद से मुलाक़ात
मैं ज़्यादा बातें नहीं करती, क्योंकि मुझसे बातें करने वाला, या मुझे समझने वाला कोई नहीं है।
यूँ तो मेरे पास कहने के लिए हर रिश्ता मौजूद है, लेकिन जो मेरे बिना बोले मुझे समझ ले, ऐसा कोई नहीं।
शायद इसलिए अब मुझे ख़ामोश रहना ही सही लगता है।
ख़ामोशी को ही मैंने अपना साथी बना लिया है। अब मैं ख़ुद से ही बातें कर लेती हूँ, जब कोई नहीं सुनता।
क्या इतना मुश्किल है किसी को समझना, उसकी बातें सुनना?
ये सवाल अब मैं ख़ुद से करती हूँ— कब तक मैं सबको समझती रहूँ, उनकी ख़ामोशी भी?
लेकिन कोई मुझे क्यों नहीं समझता?
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कभी-कभी मैं चाहती हूँ कि खुलकर जी लूँ अपना जीवन, भले ही एक दिन के लिए ही सही, लेकिन पूरी तरह जी लूँ।
जो मन कहे, वही सब करूँ— बिना सोचे, बिना डरे।
मगर फिर मेरी ज़िम्मेदारियाँ मुझे रोक लेती हैं, और मैं फिर ख़ामोश हो जाती हूँ।
मैं दूसरों को उनके जीवन में वह सब करते देखती हूँ जो वे पाना चाहते हैं।
उन्हें देखकर मैं मुस्कुरा भी लेती हूँ, और चुप भी रह जाती हूँ।
लेकिन क्या मैं सच में ख़ुश हूँ?
या फिर बस यही सोचकर मैं ख़ामोश हो जाती हूँ…
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मैं शिकायत नहीं करती, क्योंकि मुझे पता है— ये सारे रिश्ते मुझे ही सँभालने हैं, मुझे ही एक धागे में बाँधकर रखने हैं।
लेकिन क्या रिश्ते निभाना सिर्फ़ एक इंसान का फ़र्ज़ होता है?
सबकी खुशियों का, उनकी छोटी-छोटी चाहतों का ख़याल रखना ज़रूरी है, तो क्या किसी एक की ख़ामोशी मायने नहीं रखती?
क्या कोई उसकी चुप्पी समझने की कोशिश नहीं करेगा— कि वह अपने लिए क्या चाहता है?
उसे भी अपने लिए जीना है, खुली हवा में साँस लेनी है, बारिश की बूँदों में भीगना है।
उसे भी कोयल की आवाज़ सुननी है, पक्षियों की चहचहाहट में पल भर को ठहरना है।
समंदर की लहरें देखनी हैं, और उन्हें देखकर बस मुस्कुरा देना है।
क्या अपने लिए इतना चाहना ज़्यादा हो जाता है?
अगर हाँ— तो शायद उसका ख़ामोश रहना ही ठीक है।
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कभी-कभी मुझे लगता है कि कहने को मेरे पास सब रिश्ते हैं— भाई, बहन, यार, दोस्त।
लेकिन जब मुझे सच में इन सबकी ज़रूरत होती है, तो न जाने ये सब कहाँ चले जाते हैं।
तब मैं ख़ुद से पूछती हूँ— क्या वाक़ई मेरे पास कोई नहीं है?
या फिर सब कुछ होते हुए भी मेरे साथ कोई नहीं है।
शायद तब समझ आता है कि ईश्वर के सिवा इस रास्ते पर मेरा कोई नहीं—
और सच कहूँ, मेरे सिवा भी कोई नहीं।