Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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मुक्तक
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तीन लोक का स्वामी तुमको, कहती दुनिया सारी।
जीवन पथ की हर इक बाधा, करती डरती यारी।।
मन विश्वास हृदय में जिसके, छाई रहती मस्ती -
पापी सारे कष्ट भोगते, जिसके मन गद्दारी।।

नहीं रसायन से बच पाना, यही आज की पीर।
चाहे जो भी करना कर लो, और बहाओ नीर।
नये-नये रंग ढंग में अब तो, बनें रसायन रोज-
नाम प्रभो का जपते रहिए, रखकर मन में धीर।।

कुछ नहीं रखा है अब मिलने मिलाने में।
वक्त का तकाजा है सबको भगाने में।
दूर रहो तो बेहतर है इस जमाने में-
भलाई आज तो है बस बचने-बचाने में।

हर सितम सहकर भी मुस्कराते रहे।
उनके जुल्मो सितम हम भुलाते रहे।
जीत की कोशिशों में वो लगे थे मगर-
आइना मौन का हम दिखाते रहे।।

घर-घर की मुस्कान बेटियाँ।
आज रही बन शान बेटियाँ।
ऊँचा किया है नाम जग में-
बनती नव पहचान बेटियाँ।।

फैलाती हैं चमक बेटियाँ।
संबल बनती आज बेटियांँ।
नहिं बेटों से अब हैं पीछे -
घर-घर की मुस्कान बेटियाँ।।

आज किसी की बात न करिए।
कुछ भी कहने से अब डरिए।
समय के साथ चलना सीखिए-
कल की अपनी करनी भरिए।।

अश्रु लिए वो विदा हो गई।
मोहक सी मुस्कान दे गई।
जिसकी नहीं कल्पना की थी-
वो ऐसा उपहार बन गई।।

शासन सत्ता से खुदा न बनिए।
कल तुमको भी होना धनिए।
ज्ञान चक्षु अब तुम भी खोलो-
दंभ की उड़ान न भरिए।।

किसकी प्रतीक्षा में इतना अधीर हो।
लगता तो नहीं कि ये नाहक पीर हो।
सोचो समझो कि जायज है कितना -
अच्छा नहीं है कि आँखों में नीर हो।।

बताओ क्यों इतना मगन हो रहे हो।
जो खुद से ही नीचे गिरे जा रहे हो।
बताओ भला राज इसके क्या पीछे -
हवाओं के माफिक उड़े जा रहे हो।।

नाहक नहीं आप हमको सताओ।
शिकवा जो हमसे तो वो बताओ।
आखिर पता तो चले बात क्या है-
बहुत हूँ दुखी मैं नहीं अब रुलाओ।।

तीन लोक के तुम हो स्वामी।
जन-मन के हो प्रभु अनुगामी।
जिसने विश्वास किया तुम्हारा -
उसके मन का भाव नमामी।।

सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112024242
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