Hindi Quote in News by Sonu Kumar

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चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष है?
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मेरा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति भारत के 3 सबसे भ्रष्ट आदमियों की सूची बनाता है तो वह बिना आगे पीछे देखे सीधे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश, चुनाव आयुक्त एवं रिजर्व बैंक गवर्नर का नाम नाम क्रमश: 1, 2, 3 नंबर पर लिख सकता है। पीएम वगेरह जैसे पदों का नाम बहुत बाद में आता है।
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केंचुआ का मुख्य टारगेट भारत में EVM को जारी रखना एवं छोटी पार्टियों के रास्ते में पत्थर फेंकना है, ताकि उन्हें आगे बढ़ने से रोका जा सके। इसके लिए केंचुआ ने कितने और किस किस तरह के क़ानून छापे हुए है, ये आपको सिर्फ तब ही पता चलता है, जब आप चुनाव लड़ने जाते हो। फिलहाल मैंने निचे केंचुआ की एक हरकत का ब्यौरा दिया है, जिससे आप अंदाजा लगा सकते हो केंचुआ किस तरह काम करता है।
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PMP02* के नेता मोदी साहेब ने 2018 में गेजेट में फाइनेंस बिल का लेबल लगाकर एक इबारत छापी। यह इबारत कहती है कि –
कोई भी भारतीय या विदेशी व्यक्ति बैंक में पैसा जमा करके एवज में इलेक्टोरल बांड ले सकता है, और ये बांड किसी भी राजनैतिक पार्टी को दे सकता है। राजनैतिक पार्टी ये बांड अपने बैंक खाते में जमा करेगी और नियत राशि अमुक पार्टी के खाते में जमा हो जाएगी !!
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स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी X वालमार्ट या जिंदाल से 50 करोड़ का चंदा लेना चाहती है, और यह भी चाहती है कि वालमार्ट का नाम सामने नहीं आये। तो वालमार्ट बैंक में जाकर 50 करोड़ के इलेक्टोरल बांड खरीदेगा और X को दे देगा। चुनावी बांड प्रोमेसरी नोट की तरह होता है, और इस पर दाता का नाम नहीं लिखा होता। फिर X अपने बैंक को ये बांड देगा और बैंक X के खाते में 50 करोड़ ट्रांसफर कर देगा।
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अब X को अपनी लॉग बुक में सिर्फ यह लिखना है कि उसने 50 करोड़ इलेक्टोरल बांड से प्राप्त किये। X को यह नहीं बताना है कि उसे ये बांड किसने दिए थे !! और न ही केंचुआ उससे पूछेगा कि X को ये बांड किसने दिए थे !!
Now, foreign poll funding won’t be scrutinised
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साफ़ है कि मोदी साहेब एवं संघ के स्वयंसेवको ने इस क़ानून को सिर्फ इसीलिए लागू किया, ताकि बड़ी पार्टियाँ विदेशियों से गुमनाम पैसा ले सके !! और अब वे विदेशियों से पैसा ले भी रहे है।
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सबूत ?
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माफ़ कीजिये, लेकिन उन्होंने क़ानून ही इस तरह से बनाया है कि इसका कभी कोई सबूत नहीं जुटाया जा सकता !!
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मोदी साहेब ने जब यह क़ानून छापा तो PMP01* की नेता सोनिया जी एवं PMP03* के नेता अरविन्द केजरीवाल जी ने भी इस क़ानून का पूरा समर्थन किया था !! यह बिल बिना किसी चर्चा के सीधे पास हुआ। जब यह क़ानून छपा तो पेड मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि, इस क़ानून के आने के बाद राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता आएगी !!!
( PMP01* = में PMP से आशय पेड मीडिया पार्टी है, और 01 कोंग्रेस का कोड है। बीजेपी=संघ का कोड 02 एवं आम आदमी पार्टी का कोड 03 है। पेड मीडिया पार्टी से आशय ऐसी पार्टी से होता है, जो पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के समर्थन में रहती है। पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा क्या है, इस बारे में फिर किसी जवाब में। ).
पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले किसी भी बुद्धिजीवी या जीनियस से आप इस बारे में पूछेंगे कि फाइनेंस बिल क्या है, तो वह आपको आज भी यही बतायेगा कि इस बिल से चुनावी भ्रष्टाचार कम होगा, और चंदे में पारदर्शिता आएगी !! पारदर्शिता कैसे आएगी, इस बारे में ये बुद्धिजीवी आपको कुछ नहीं बताएँगे। क्योंकि पेड मीडिया ने भी इन्हें इस बारे में कुछ नहीं बताया है। पेड मीडिया ने इन्हें सिर्फ इतना ही बताया है कि, इससे पारदर्शिता आती है !! बस !!
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कांग्रेस एवं बीजेपी को 2010 में हाई कोर्ट ने विदेशियों से चंदा लेने का दोषी ठहराया था। तब से इस मामले पर कार्यवाही लंबित थी। अत: मोदी साहेब ने इस क़ानून को भूतलक्षी प्रभाव ( Retrospectively ) के साथ छापा। यदि मोदी साहेब इस क़ानून को 10 साल पीछे जाकर यानी 2008 से भी लागू करते तो कांग्रेस एवं बीजेपी दोनों ही इस भ्रष्टाचार की चपेट में आने से बच जाते। किन्तु कांग्रेस को उनके अन्य पुराने पापो से बचाने के लिए मोदी साहेब और भी पीछे गए !!
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कितना पीछे ?
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मोदी साहेब ने इस बिल को 42 साल पीछे जाकर यानी 1976 से लागू किया !! मतलब 2010 में कांग्रेस-बीजेपी ने जो अपराध किया था और जो मामला अभी चल रहा है , वह अपराध अब गैर कानूनी नहीं रह गया है , बल्कि कानूनी हो गया है !! और 1976 के बाद में किये गए ऐसे सभी अपराध भी अब अपराध नहीं रहे !! बताइये !!
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जब मोदी साहेब ने यह क़ानून छापा था तो राईट टू रिकॉल पार्टी ने इस क़ानून का विरोध किया था और उनके कार्यकर्ताओ ने पीएम को ट्विट भेजे थे कि इस बकवास क़ानून को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए। किन्तु उन्होंने इस क़ानून को जारी रखा।
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अब 2020 में केंचुआ एवं पेड मीडिया की हरकत देखिये :
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आज से 4 दिन पहले यानी 10 फरवरी 2020 को पेड नेशनल हेराल्ड एवं Paid The Print ने यह खबर लगाईं कि – चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बांड से पैसा जुटाने वाली जिन पार्टियों की सूची का एफिडेविट दिया है उनमे राईट टू रिकॉल पार्टी का नाम भी है !!
Unrecognised parties receive funds via electoral bond scheme
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These parties don't have a fixed symbol but still got cash through electoral bonds
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They include Sabse Badi Party, Rashtriya Peace Party, Hindustan Action Party, Nagarik Ekta Party, Bharat Ki Lok Jimmedar Party, Vikas India Party and Right to Recall Party, according to a submission made by the Election Commission (EC) in the Supreme Court this week.
A registered but unrecognised political party cannot contest elections on a fixed symbol of its own. It chooses from a list of symbols the Election Commission provides. This makes it difficult to track the electoral history of such parties.
सुप्रीम कोर्ट में केंचुआ (EC) द्वारा प्रस्तुत एफिडेविट के अनुसार, इसमें सबसे बड़ी पार्टी, राष्ट्रीय शांति पार्टी, हिंदुस्तान एक्शन पार्टी, नगरिक एकता पार्टी, भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी, विकास इंडिया पार्टी और राइट टू रिकॉल पार्टी शामिल है।
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पेड नेशनल हेरल्ड एवं पेड द प्रिंट ने हवाला दिया है कि, केंचुआ ने सुप्रीम कोर्ट में यह हलफनामा दाखिल किया है। अब या तो केंचुआ का यह शपथपत्र पूरी तरह से झूठा है, या फिर पेड नेशनल हेरल्ड एवं पेड द प्रिंट को झूठी खबर लगाने के लिए भुगतान किया गया है।
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सबूत ?
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क्योंकि राईट टू रिकॉल पार्टी के पास कोई बैंक खाता नहीं है। और पार्टी के पास पहले भी कोई खाता नहीं रहा है। RRP ने आज तक कभी भी कोई बैंक एकाउंट नहीं खुलवाया। यह पार्टी पैसो का कोई लेनदेन करती ही नहीं है। जब से पार्टी बनी है, तब से पार्टी के पास शून्य रूपये है। कोई बैंक खाता नहीं, कोई एनजीओ नहीं, कोई ट्रस्ट नही, कोई चंदा नहीं , कोई कैश नहीं। राईट टू रिकॉल पार्टी ने आज तक कभी किसी भी रूप में कोई चंदा भी नहीं लिया है !!
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और यह बात केंचुआ को भी मालूम है कि, राईट टू रिकॉल पार्टी के पास न तो कोई खाता है, और न ही इनके पास पैसा है। कैसे ?
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यदि पार्टी किसी चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारती है तो उन्हें ऑडिट करके चुनावी खर्चे का हिसाब केंचुआ को भेजना पड़ता है। तो हर विधानसभा में चुनाव में RRP पार्टी के उम्मीदवार चुनाव लड़ते है, और फिर केंचुआ को हिसाब भी भेजा जाता है। अभी तक जितनी भी बार उन्हें हिसाब भेजा गया है, उसमे राईट टू रिकॉल पार्टी की सभी एंट्रियाँ शून्य, शून्य, शून्य या Nil, Nil Nil होती है। और हिसाब की लॉग बुक में लिखा जाता है कि – कोई बैंक खाता नहीं, कोई अनुदान नहीं, कोई चंदा नहीं, कोई नकदी नहीं !!
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और RRP अभी तक इस तरह 4 चुनावों का हिसाब भेज चुकी है। RRP के उम्मीदवारों को चुनाव खुद के खर्चे पर लड़ना होता है, और उन्होंने जितना खर्चा किया उसका हिसाब एक उम्मीदवार के रूप में वे सीधे केंचुआ को भेजते है।
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इलेक्टोरल बांड को भुनाने के लिए इसे एकाउंट में जमा करना होता है। जब पार्टी के पास बैंक खाता ही नहीं है तो फिर पार्टी इलेक्टोरल बांड को कहाँ जमा करेगी, और कहाँ से पैसा लेगी !! बताइये !!!
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यह खबर क्यों लगवायी गयी ?
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इसके पीछे 2 वजहें है :
1. छवि ख़राब करना : कुछ 40 से 50 लाख पाठको तक उन्होंने यह जानकारी पहुंचा दी है कि इन लोगो को गुमनाम पैसा मिल रहा है। और पाठको की खोपड़ी में यह कील भी ठोक दी है कि, बड़ी पार्टियों को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिले तो कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि उन्हें तो ट्रेक किया जा सकता है। पर जिन पार्टियों को परमानेंट सिम्बल नहीं मिला है उन्हें ट्रेक नहीं किया जा सकता, अत: यदि छोटी पार्टियों को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिले तो यह खतरनाक है !!
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खबर को फिर से पढ़ें कि इसे किस तरह ड्राफ्ट किया गया है --
A registered but unrecognised political party cannot contest elections on a fixed symbol of its own. It chooses from a list of symbols the Election Commission provides. This makes it difficult to track the electoral history of such parties.
एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल अपने स्वयं के निर्धारित प्रतीक पर चुनाव नहीं लड़ सकता है। यह केंचुआ द्वारा प्रदान किए गए प्रतीकों की एक सूची चिन्ह चुनता है। इससे ऐसी पार्टियों के चुनावी इतिहास को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।
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( स्थायी चुनाव चिन्ह हासिल करने के लिए किसी राज्य या लोकसभा चुनाव में कुल मतों के 5% वोट लाने होते है !! )
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मतलब, न्यूज पाठक के दिमाग में यह बात डालती है कि यदि मान्यता प्राप्त पार्टी को इलेक्टोरल बांड से पैसा मिलता है तो कोई भ्रष्टाचार नहीं होता है, किन्तु छोटी पार्टियों को यदि बांड से पैसा मिले तो यह दुरूपयोग है !! क्यों ? क्योंकि स्थायी चिन्ह नहीं होने के कारण इनके इतिहास को ट्रेक नहीं किया जा सकता !! मतलब क्या है इस बात का !!
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सभी रजिस्टर्ड पार्टियों की पूरी कुंडली केंचुआ के पास रहती है। 800 पेज का एप्लीकेशन जमा करना पड़ता है, तब जाकर वे साल भर में पार्टी को रजिस्टर्ड करते है। कौन पार्टी कितने उम्मीदवार उतार रही है, कहाँ से उतार रही है, सब की सूचना देनी होती है। हर उम्मीदवार को 28 पेज का एफिडेविट देना पड़ता है। चुनाव के दौरान दिन में 2 बार केंचुए को रिपोर्ट करना पड़ता है।
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क्या पेम्पलेट छपवा रहे हो, किधर प्रचार कर रहे हो इत्यादि प्रकार की सभी सूचनाएं देनी होती है। इन सब से वो ट्रेक नहीं कर सकते !! लेकिन स्थायी सिम्बल मिलने के बाद वे ट्रेक कर लेंगे !! तो ठीक है, 5% वोट लाने का क़ानून निकाल दो और रजिस्टर्ड पार्टियों को परमानेंट सिम्बल दे दो, ताकि छोटी पार्टियों को भी ट्रेक कर सको। पर ऐसा तो उनने करना नहीं है !! क्योंकि इससे बड़ी पार्टियों की ताकत कम हो जायेगी।
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और PMP02 एवं PMP01 के पास तो परमानेंट सिम्बल है न, तो बताओ PMP02 को पिछले साल जो 950 करोड़ और PMP01 को जो 150 करोड़ का चंदा इलेक्टोरल बांड से मिला है, उसका सोर्स क्या है ? कौनसा अखबार या केंचुआ बतायेगा कि PMP01 एवं PMP02 ये 1100 करोड़ किधर से लेकर आई है !! ट्रेक करो और बता दो !! है हिम्मत ?
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2. टाइम ख़राब करना : अभी एक लेटर केंचुआ को लिखना पड़ेगा और एक-एक लेटर पेड नेशनल हेरल्ड एवं Paid The Print को भी लिखना पड़ेगा। मतलब 12 से 14 घंटें तो इसमें ही फुंक जायेंगे। केंचुआ की यह सबसे मुख्य नीति है, छोटी पार्टियों के प्राण पीने की। वो हर महीने किसी न किसी टाइप का एक पटाका फेंकता रहता है, ताकि टाइम चूसा जा सके। वे जानते है कि, छोटी पार्टियों के पास स्टाफ वगेरह नहीं होता, तो वे उन्हें इस तरह के क्लर्की वर्क में उलझाकर रखते है। अब केंचुआ तो इस तरह के पुरजो का कोई जवाब भेजता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट जायेंगे तो वहां इनके भी बाप बैठे हुए है।
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इसके बाद राईट टू रिकॉल पार्टी के कार्यकर्ताओं को आगे भी हमेशा के लिए यह स्पष्टीकरण देते रहना पड़ेगा कि, RRP को इलेक्टोरल बांड से कोई पैसा नहीं मिला। लेकिन ज्यादातर लोग RRP की बात का विश्वास नहीं करेंगे। वे केंचुआ, नेशनल हेरल्ड की बात को ही विश्वसनीय मानेंगे। तो RRP के कार्यकर्ताओ को अब आने वाले कई सालों तक भी लगातार यह स्पष्टीकरण देते रहना पड़ेगा !! और इसमें RRP के कार्यकर्ताओ के लाखों घंटे बर्बाद होते रहने वाले है !!
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बुद्धिजीवी यह तर्क देंगे कि आप लोग केंचुआ एवं मीडिया हाउस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट क्यों नही गए, मानहानि का दावा क्यों नहीं किया आदि। पर बुद्धिजीवियों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सुप्रीम कोर्ट में पाँव रखने में भी 25 हजार का खर्चा हो जाता है, जो कि छोटी पार्टियों के लिए एक बड़ी राशि होती है।
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भारत में 3 संस्थाएं ऐसी है जो 1950 से ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के कंट्रोल में रही। 2002 तक यह नियंत्रण बढ़ता-घटता रहा, किन्तु पेड मीडिया की शक्ति बढ़ने के कारण आज यह निर्णायक स्तर तक बढ़ गया है। इन तीनो संस्थाओ के मुखिया की नियुक्ति अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों यानी कि पेड मीडिया के प्रयोजको से कंसल्ट करने के बाद की जाती है। यदि पीएम इन 3 संस्थाओ को कंट्रोल करने की कोशिश करेगा तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं पीएम के बीच तनाव बढ़ जाएगा, और वे पेड मीडिया का इस्तेमाल करके पीएम को गिराने की कार्यवाही करना शुरू कर देंगे। ये तीन संस्थाएं है :

सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायधीश
चुनाव आयुक्त
रिजर्व बैंक गवर्नर

इन तीनो संस्थाओ के पास पीएम को डिस्टर्ब करने और यहाँ तक की गिराने की ताकत भी है।
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अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पेड मीडिया के माध्यम से इन तीनो संस्थाओ का ऐसा हव्वा खड़ा किया हुआ है कि न तो इन संस्थाओ के मुखिया पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जा सकता है, न ही इनके खिलाफ कभी कोई जांच खोली जा सकती है, न ही इन्हें दण्डित किया जा सकता है।
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यदि पीएम इनसे पंगा लेने जाता है तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों द्वारा नियंत्रित पेड मीडिया इन 3 संस्थाओ के साथ खड़ा हो जायेगा और पूरे देश में इस तरह का ड्रामा स्टेज किया जाएगा कि पीएम इन “निष्पक्ष एवं संवैधानिक” संस्थाओ को दबाने या नियंत्रित करने के प्रयास कर रहा है, और पीएम की यह हरकत लोकतंत्र की हत्या है, असंवैधानिक, है आदि आदि !!
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और उन्होंने पेड मीडिया के माध्यम से नागरिको के दिमाग में भी यह बात बहुत अच्छी तरह से डाली हुई है कि ये संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र एवं संविधान की रक्षक है, इन पर हमला करना मतलब संविधान पर हमला है, आदि आदि, और इसी टाइप की फालतू बातें। तो जब भी पीएम एवं इन संस्थाओं के बीच आपस में टकराव आएगा तो पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित सभी बुद्धिजीवी इन संस्थाओ के समर्थन में चले जाते है। केंचुआ एवं भ्रष्ट जजों का इस्तेमाल करके पीएम को गिराने का एक अच्छा उदाहरण आप इस जवाब में पढ़ सकते है – क्या इंदिरा गांधी वाक़ई सबसे ताक़तवर भारतीय प्रधानमंत्री थीं?
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केंचुआ किस तरह पीएम एवं अन्य राजनैतिक दलों को कंट्रोल करता है ?
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पहली बात तो अकेला केंचुआ अपने बूते पर पीएम का कुछ उखाड़ नहीं सकता। किन्तु पेड मीडिया के प्रायोजक केंचुआ+सुप्रीम कोर्ट+पेड मीडिया की सहायता से पीएम को 3 दिन में जमा कर सकते है। वे ऐसा कैसे करते है और कैसे कर सकते है, इसका जवाब बहुत लम्बा हो जाएगा। अत: निचे मैंने इसे संक्षेप में बताया है।
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EVM पर कंट्रोल : पेड मीडिया द्वारा EVM के बारे में नागरिको को काफी अफीम पिलाई गयी है। पेड मीडिया द्वारा इसमें से एक सबसे बड़ा झूठ यह है कि PMP02 पार्टी EVM को हैक करके चुनाव जीतती है !! यह एकदम बकवास आरोप है ।
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(a) असल में पीएम कभी भी EVM को कंट्रोल नहीं कर सकता।
चुनावों की घोषणा होने के बाद पीएम केंचुआ के दफ्तर में न तो कदम रख सकता है, न ही उन्हें कोई निर्देश दे सकता है !! केंचुआ पूरी तरह से पीएम के कंट्रोल से बाहर होता है। निम्नलिखित फैसले सिर्फ केंचुआ लेता है और पीएम का इसमें शून्य दखल होता है :
EVM का डिजाइन केंचुआ तय करता है
EVM कहाँ बनेगी केंचुआ तय करता है
EVM कहाँ स्टोर होगी केंचुआ तय करता है
इसके ट्रांसपोर्टेशन का ठेका किस कम्पनी को जाएगा, केंचुआ तय करता है
यदि EVM में वोटो की हेराफेरी का कोई आरोप है, तो खुद की जांच भी केंचुआ खुद ही करता है, और खुद को क्लीन चिट भी जारी करता है !!
EVM के बारे में पीएम कोई जांच नहीं खोल सकता।
यदि पीएम केंचुआ से EVM का डिजाइन मांगे तो केंचुआ नहीं देगा
पीएम के पास केंचुआ का सिर्फ यह इलाज है कि, पीएम सुप्रीम कोर्ट के पास जा सकता है। किन्तु यदि सुप्रीम कोर्ट और केंचुआ एक ही पाले में है तो पीएम के हाथ में कुछ नहीं है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट केंचुआ से भी आगे की आयटम है, और पीएम के काबू से बाहर है। कैसे ?
सुप्रीम कोर्ट अपनी नियुक्ति खुद ही करता है। और खुद की नियुक्ति खुद करने की इस प्रक्रिया पर आपको आपत्ति है तो इसकी अपील भी खुद सुप्रीम कोर्ट में ही होती है। मतलब वे खुद के मुकदमे खुद ही सुनते है और खुद ही खुद को बरी कर देते है !!
यदि पीएम कोई क़ानून छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के पास अमुक क़ानून को केंसल करने की संवैधानिक शक्ति है
सुप्रीम कोर्ट पीएम के खिलाफ कोई भी जाँच खुलवा सकता है, और पीएम के खिलाफ जांच करने वाली एजेंसी यानी सीबीआई को सीधे अपनी निगरानी में ले सकता है।
सुप्रीम कोर्ट पीएम के खिलाफ कोई भी मुकदमा स्वीकार करके पीएम को दोषी ठहरा सकता है, और पीएम को जेल भी भेज सकता है !!
सुप्रीम कोर्ट पर कोई आरोप भी नहीं लगाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट पर आरोप लगाना भी गैर कानूनी है !! मतलब वे अवमानना के मामले में आपको जेल में डाल देते है !!
सार यह है कि, पीएम केंचुआ से इसीलिए नहीं भिड़ सकता क्योंकि केंचुआ के पीछे एनाकोंडा खड़ा है । और जैसे ही पीएम केंचुआ एवं सुप्रीम कोर्ट से टकराव लेगा वैसे ही पेड मीडिया के प्रायोजको से इशारा मिलने के बाद देश के सभी पेड पत्रकार, पेड संपादक, पेड बुद्धिजीवी, सभी राजनैतिक पार्टियो के नेता पीएम पर आरोप लगाना शुरू कर देंगे, कि पीएम संवैधानिक संस्थाओ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है !!
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दुसरे शब्दों, में पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में EVM को जारी रखना चाहते है, ताकि EVM के माध्यम से पीएम एवं अन्य राजनैतिक पार्टियों के नेताओ की घड़ी दबाकर रखी जा सके। केंचुआ एवं सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से वे EVM को कंट्रोल करते है और EVM के माध्यम से नेताओं को। और पेड मीडिया के माध्यम से ही वे आपको यह पुड़िया देते है कि, पीएम EVM को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है !! जबकि सच यह है कि पीएम तो खुद EVM का विक्टिम है !!
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वे अपनी सभी प्रायोजित पार्टियों को समय समय पर साँसे देकर एक संतुलन बनाकर रखते है। यदि PMP02 कंट्रोल से बाहर जाने लगेगी तो वे EVM का इस्तेमाल करके PMP03 का वोट शेयरिंग बढाने लगेंगे, और PMP03 उनके एजंडे से बाहर जायेगी तो फिर से PMP01 का वोटिंग काउंट बढ़ने लगेगा। 2023 तक पेड मीडिया का इस्तेमाल करके वे PMP03 को राष्ट्रिय स्तर पर स्थापित कर देंगे और तब PMP03 2024 के चुनावों में PMP02 के नेताओं के लिए किल स्विच का काम करेगी।
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(b) EVM को हैक किया जा सकता है।
यह दूसरी बकवास है जिसे पेड मीडिया द्वारा EVM मुद्दे की बैंड बजाने के लिए फैलाया गया है। सच्चाई यह है कि, EVM एक इलेक्ट्रोनिक डिवाइस है, और यह उसी के इशारों पर काम करती है, जिसने इसे प्रोग्राम किया हो। मतलब EVM को प्रोग्राम किया जा सकता है, किन्तु इसे हैक नहीं किया जा सकता
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EVM की प्रोग्रामिंग केंचुआ करता है, अत: EVM ठीक उसी तरह से काम करेगी जिस तरह केंचुआ चाहेगा। उन्होंने प्रोग्रामिंग शब्द को साइड में करने के लिए हैकिंग शब्द को इस तरह से फैलाया जिससे लगे कि जिस तरह इंटरनेट में हैकिंग होती है, उसी तरह से EVM भी हैक हो सकती है। जो कि एक झूठी बात है। यह थ्योरी इसीलिए गढ़ी गयी ताकि इस तथ्य को चर्चा से बाहर रखा जा सके कि केंचुआ खुद ही EVM में वोटो की हेरा फेरी करता है, और केंचुआ के अलावा यह हेरा फेरी और कोई कर भी नहीं सकता।
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(c) केंचुआ जब बुलाता है तो कोई EVM का कोई हैकर नहीं जाता।
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केंचुआ न तो EVM खोलने देता है, और न ही इसका डिजाइन देता है। केंचुआ का स्टेंड रहता है कि EVM में प्रोग्राम मेरा रहेगा और तुम EVM को हैक करके दिखाओ !! चूंकि केंचुआ EVM को खोलने नहीं देता, अत: कोई भी इंजीनियर उसके चेलेंज में नहीं जाता है। और इंजीनियर्स को जादू आता नहीं है !!
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इस वीडियो में सोफ्टवेयर इंजीनियर राहुल मेहता जी ने जन्तर मंतर पर पब्लिक डेमो में बताया है कि, EVM में केंचुआ कैसे धांधली करता है। कृपया वीडियो देखें - https://www.youtube.com/watch?v=jnazWH5715Q&fbclid=IwAR3odKoAuVCl7B1-lfSa0pjvMkxO7c5ew8ddS2rNY-wnHO3dxp5WP8YD08o
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केंचुआ किस तरह EVM में वोटो की हेराफेरी करता है इस बारे में यह जवाब पढ़ें – Pawan Kumar Sharma का जवाब - ईवीएम मशीन के साथ वीवीपैट क्यों लगाई जाती है?
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समाधान ?
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(1) पेड मीडिया द्वारा इस तरह की फर्जी ख़बरें छापने एवं केंचुआ द्वारा इस तरह के झूठे एफिडेविट देने जैसी हरकतें रोकने के लिए जूरी कोर्ट की जरूरत है। अभी पेड मीडिया कुछ भी उल्टा पुल्टा छाप सकता है, क्योंकि उन्हें पता है कि कोई सजा तो होने वाली नहीं है। जूरी कोर्ट आने के बाद इस तरह के मामलो की सुनवाई नागरिको की जूरी करने लगेगी, अत: पेड मीडिया एवं केंचुआ इस तरह की हरकत करने का जोखिम नहीं उठाएंगे।
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(2) हमें EVM केंसल करके बेलेट पेपर की तरफ लौट आना चाहिए। जब तक भारत में EVM शुरू रहेगी तब तक पीएम एवं सभी राजनैतिक पार्टियाँ पेड मीडिया के एजेंडे को आगे बढाने के लिए बाध्य है। यदि वे पेड मीडिया के एजेंडे को आगे नहीं बढ़ाएंगे तो पेड मीडिया EVM का इस्तेमाल करके उन्हें चुनाव हर देगा।
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पेड मीडिया के प्रयोजको का एजेंडा क्या है, और कैसे वो भारत के पीएम को कंट्रोल करते है इस बारे में विस्तृत रूप से मैं फिर किसी जवाब में लिखूंगा।
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Hindi News by Sonu Kumar : 112019598
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