Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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"नाम विरहित प्रार्थना"
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अंतरिक्ष में भटकता
नाम विरहित ग्रह
जिसके पास कोई प्रकाश नहीं।

आवारा दुनिया
में बोझ नहीं होता
लेकिन हर एक पास
अपनी एक आकाशगंगा होती है
जिसमें तारों को गुलामों की तरह
इस्तमाल किया जाता है।

चुंबकीय बल
न होने पर भी
रौशनी जन्म ले सकती है।

प्रार्थना के पत्र
अंतरिक्ष के कचरे से ज्यादा गुणा है
और अचरच कि बात
ये अलग अलग नहीं है
किसी भी भाषा में
इनका मतलब है
हम फंस चुके हैं
हे प्रभु, या कोई भी
अगर वहां मौजूद हो
हमें छुड़ाओ।

गति रुकी हुई
दुनिया फिर भी
अपनी पारिवारिक माहौल में
कोई खोज कर रही है।

परिवार सबसे बड़ा झूठ है
कहा से निर्माण हुआ
जा कहा रहे हो
बस सवाल की कस्ती
भटक रही है
उसी नाम विरहित पत्थर की तरह।

धड़कन बंद है
फिर भी चलती हुई सांस
रुकने का नाम नहीं ले रही
ये जिंदगी नहीं है
न ही इसे मौत कहा जा सकता है।

काली बर्फ के नीचे
ऑक्सीजन की खिड़कियों में
बस निर्वाण ही तैर रहा है।

पेट्रोल पंप पर
हज़ार प्रकाश वर्ष दूर
कोई महंगाई की
तकरार कर रहा ऊब चुका है।

हाथों में पकड़े ठंडे चांद को
सूरज के रक्तिम गोले में
घोलकर शाम को हमेशा ही
कोई बच्चा चूसता रहता है।

सब धोखा है
बस कोई धोखा नहीं
वह जगह एक ही है
ऐसी कोई जगह ही नहीं है
उसी जगह मरे हुए लोग
कभी-कभी अपनी मीठी
अनंत निंद के चलते
भूल जाते हैं
कि उनके होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता
नाटक चलता रहता है
पर्दा गिरता नहीं
बस उठता है
दूसरी नींद में प्रवेश होने के लिए।

नींद के भीतर
एक और नींद का दरवाज़ा है
जहाँ सपने नहीं आते
बल्कि
सपनों की हड्डियाँ रखी होती हैं।

कोई उन्हें चबाता नहीं
बस गिनता है
जैसे कोई बूढ़ा खगोलशास्त्री
मर चुके तारों की संख्या याद कर रहा हो।

वहाँ समय नहीं बहता
वह जमा रहता है
किसी जमे हुए खून की तरह
जिसे कोई छूने से डरता है
क्योंकि
छूते ही वह फिर से बहने लगेगा।

एक आवाज़ है
जो सुनाई नहीं देती
फिर भी
हर शून्य उसी से भरा है।

वह पूछती नहीं
वह बताती भी नहीं
बस उपस्थित रहती है—
जैसे गलती से बचा हुआ सत्य।

उंगलियों के बीच से
फिसलती हुई दिशाएँ
अपने ही नक्शे खा चुकी हैं
अब कोई उत्तर
उत्तर नहीं रहा।

दक्षिण ने खुद को निगल लिया है
पूर्व पश्चिम की स्मृति में
सड़ रहा है।

और बीच में
एक बिंदु है—
जो कहीं नहीं है
लेकिन हर जगह से
देखा जा सकता है।

वहीं बैठा है
एक और “मैं”
जो मुझे देख रहा है
जैसे मैं उसे लिख रहा हूँ।

हम दोनों में से
कौन असली है
यह तय करने के लिए
कोई तीसरा नहीं है।

और शायद
यही सबसे बड़ा सबूत है
कि हम दोनों ही
गलत हैं।

एक पुराना शरीर
अपनी ही परछाई को
कंधे पर ढोता हुआ
उस बिंदु के चारों ओर
चक्कर काट रहा है।
उसे लगता है

वह आगे बढ़ रहा है
लेकिन उसके पांव
वहीं धँस चुके हैं
जहाँ से उसने
पहला सवाल पूछा था।

प्रार्थनाएँ अब
शब्द नहीं रहीं
वे
अधूरे इशारों में बदल चुकी हैं—
कटी हुई उंगलियों की तरह
जो अब भी
किसी दिशा की ओर इशारा कर रही हैं।

लेकिन दिशा…
अब कोई जवाब नहीं देती।

एक क्षण के लिए
सब कुछ रुकता है—
इतना रुकता है
कि रुकना भी
अपनी परिभाषा खो देता है।

और उसी क्षण
एक हल्की दरार पड़ती है
अस्तित्व के कांच में।

उस दरार से
ना प्रकाश आता है
ना अंधकार—
बस एक संभावना
जो खुद को साबित नहीं कर पाती।

कोई उसे “ईश्वर” कहता
तो शायद
वह तुरंत मर जाती।

इसलिए
वह बिना नाम के ही
जिंदा है।

और वही
सबसे बड़ी प्रार्थना है
जिसे कभी
कहा नहीं गया।
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Hindi Poem by Anup Gajare : 112019419
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