"ईर्ष्या"
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पागल होते दिनों में
रात के कंबल ओढ़कर
सुनाता रहता हु
कठिन हत्याओ के गीत।
जिसने रंगों में भर दिया
रक्तिम नदी को
उसके भीतर भी
कुछ नहीं होगा
उसके ऊपर गुरुत्वाकर्षण
के बीज बोने के बाद
खनिज तेल निकालते हुए
कितनी चींटियां मारी गई।
हर हादसे के पीछे
खामोश यकीन ही
नई शिकायत बनी रही।
पेड़ो को काटने के बाद
उसने मिट्टी से भरे हाथ
लाल नदी में धोये थे।
कई पीड़ाएं अंत
में पीड़ित को नहीं छोड़ती
परछाई हमेशा जिंदा रहती है
किसी के बिच बहुत कुछ नहीं होता
जब टूटे संसार के बादल
बरसने लगते है
लाल वर्षा।
ऋतु में कोई नहीं
छोड़ता अपने पैरों के निशान
हर एक अखबार में
फैली हैं कितनी
करुण हत्याएं।
हे बाप युद्ध शुरू है
अपने गरीब बेटे भेज देना सरहद पर
ताकी कोई सरहद न बचे।
वातानुकूल परिस्थिति में
ही युद्ध के अहम फैसले लिए जाते रहे
क्यों किसी झोपडी में ये तय नहीं हुआ
कि, अमीर के बेटे लड़ेंगे युद्ध की त्रासदियों को।
वे तमाम कातिल
भीतर भी निर्माण करते रहे
उन्हीं फसलों को
जिसके परिणाम
ऊपरी सतह पर ही दिखाई दिए हमेशा।
रेखा कभी सीधी खींची न जा सकी
गोल बनना ही तकदीर रही हर अनंत की।
गुलाब हमेशा
उनके गार्डन में ही सुगंध देते रहे
जिन्हें खून की गंध मालूम ही न थी।
कितनी सीढ़ियां चढ़ने
के बाद उसने खींचा पड़दा
रंगभूमि की हत्या
सबसे बड़ी कविता थी।
उन दिनों भीतर
बैठे शैतान से
बातचीत की सुलह करता रहा
उसने कहा
पहले समझना होगा
मुश्किल को मुश्किल से ही हल
किया जा सकता है।
कुदरत की पहली हत्या कब हुई थी?
क्या मालूम
पहला गुनहगार कौन था।
जिसने भीतर के झुंड को
कभी शांत न होने दिया
शायद
पत्थर के नुकीले कोणों से ही
पहल हुई होगी।
फिर इंसान के शमशान में
हर एक मंत्र के बीच की अधूरी जगह में
न जाने कितने प्राण भर गए होगे।
थके हुए पशु ने
समझा होगा कि,
आलस्य
समय की हत्या है—
घड़ी चलती रहती है
पर मनुष्य
अपने ही दिनों को
कुर्सियों पर सुला देता है।
लालच
भोजन की हत्या है—
थाली में बचा हुआ अन्न
कभी-कभी
भूख से ज्यादा
मनुष्य की भूख को दिखाता है।
क्रोध
शांति की हत्या है—
एक क्षण का ज्वालामुखी
सालों की
ठंडी झील को
उबाल देता है।
पर ईर्ष्या…
ईर्ष्या
सबसे धीमी हत्या है।
यह
समय को नहीं मारती,
अन्न को नहीं मारती,
न ही
शांति को ही।
यह
मनुष्य को
मनुष्य से अलग कर देती है।
दोस्त की हँसी में
कांटा उगा देती है,
और किसी की सफलता को
जहर बना देती है।
ईर्ष्या में
कोई तलवार नहीं होती—
फिर भी
सबसे ज्यादा खून
इसी में बहता है।
क्योंकि
ईर्ष्या
दूसरे मनुष्य को नहीं
पहले
हमारे भीतर के मनुष्य को
मारती है।
ईर्ष्या ही जननी रही हो
उस पहली पंक्ति की
जिसे किसी किताब के पन्ने में
मनुष्य हत्या के रूप में
अबतक दर्ज न करवा सका हो।
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