ऋगुवेद सूक्ति- (२१) की व्याख्या
“न ऋषत्वावतः सखा” — ऋग्वेद १/११/८
भावार्थ --हे प्रभु! आपका सखा कभी दुखी नहीं होता।
यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मंडल, ११वें सूक्त, ८वें मंत्र में आता है। यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है।
मूल मंत्र (१.११.८)
न ऋष्यति त्वावतः सखा ।
पदच्छेद--
न ऋष्यति = नष्ट नहीं होता, क्षति नहीं पाता।
त्वावतः = तुझ जैसे (महान) का
सखा = मित्र
भावार्थ--
हे प्रभु! जो तुम्हारा सखा (भक्त) है, वह कभी नष्ट नहीं होता, उसे कोई हानि नहीं पहुँचती।
आध्यात्मिक अर्थ--
यह मंत्र यह बताता है कि जो पुरुष ईश्वर के आश्रय में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं परम शक्ति करती है।
यहाँ “सखा” शब्द भक्त और ईश्वर के घनिष्ठ सम्बन्ध को दर्शाता है।
इसी भाव की पुष्टि अन्य ग्रन्थों में भी मिलती है—
“ईश्वर का सखा (भक्त) नष्ट नहीं होता” —
उसके समर्थन में अन्य वेदों से प्रमाण निम्न हैं:
१. ऋग्वेद--
(१) ऋग्वेद १०.१५२.१
न तस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन।
अर्थ: जो परमात्मा का सखा है, वह न कभी मारा जाता है, न पराजित होता है।
(२) ऋग्वेद--११.३१.६
अग्ने मित्रो न शोचिषा।
भाव: हे अग्नि (ईश्वर)! तू अपने भक्तों का मित्र बनकर उनकी रक्षा करता है।
२. यजुर्वेद--
(क) यजुर्वेद ४०.१७ (ईशावास्य उपनिषद् मंत्र-- १७)
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्…
अर्थ: हे प्रभु! हमें उत्तम मार्ग से ले चल, हमारे पापों को दूर कर।
यहाँ स्पष्ट है कि ईश्वर शरणागत का मार्गदर्शक और रक्षक है।
(ख) यजुर्वेद-- ३६.१८
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
अर्थ: मैं सब प्राणियों को मित्रभाव से देखता हूँ।
ईश्वर का मार्ग मित्रभाव और संरक्षण का है।
३. अथर्ववेद --१९.६७.१
भद्रं नो अपि वातय मनः।
अर्थ: हमारा मन कल्याण की ओर प्रवाहित हो।
ईश्वर-आश्रित मनुष्य का कल्याण सुनिश्चित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि उपनिषदों में अनेक स्थानों पर मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. कठोपनिषद् (१.२.२३)
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
अर्थ: आत्मा न तो वाक्चातुर्य से, न बुद्धि से, न अधिक श्रवण से मिलता है;
जिसे वह (परमात्मा) स्वयं स्वीकार करता है, उसी को वह प्राप्त होता है।
जो ईश्वर द्वारा “स्वीकृत” है, वही सुरक्षित और धन्य है।
२. मुण्डकोपनिषद् (३.२.३)
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः…
और आगे (३.२.९):
ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।
अर्थ: ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
जो ब्रह्म से एकत्व प्राप्त करता है, वह नाश से परे हो जाता है।
३. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.१८)
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥
अर्थ: जो ब्रह्मा को उत्पन्न करता है, वेदों का उपदेश देता है —
उस परमदेव की मैं मुक्ति के लिए शरण लेता हूँ।
शरणागति ही सुरक्षा का मार्ग है।
४. छान्दोग्य उपनिषद्-- (७.१.३)
तारति शोकमात्मवित्।
अर्थ: आत्मा को जानने वाला शोक से पार हो जाता है।
जो परमात्मा को जान लेता है, वह दुख और विनाश से परे हो जाता है।
५. बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.१४)
अभयं वै जनक प्राप्स्यसि।
अर्थ: (याज्ञवल्क्य कहते हैं) हे जनक! तू अभय (निर्भयता) प्राप्त करेगा।
ब्रह्मज्ञान से भय और विनाश का अंत होता है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का स्पष्ट सिद्धान्त है—
जो ईश्वर की शरण में है, वह अभय है।
जो ब्रह्म को जानता है, वह शोक, भय और नाश से पार हो जाता है।
ईश्वर स्वयं अपने भक्त को स्वीकार कर उसकी रक्षा करता है।
अतः ऋग्वैदिक वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” —
उपनिषदों द्वारा पूर्णतः समर्थित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि अनेक पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. श्रीमद्भागवत महापुराण
(१) ६.१७.२८
नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति।
स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः॥
अर्थ: जो नारायण-परायण हैं, वे किसी से भी नहीं डरते;
स्वर्ग, मोक्ष या नरक—सबमें समान भाव रखते हैं।
ईश्वर-भक्त निर्भय और सुरक्षित होता है।
(२) १०.१४.८
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो…
भाव: जो व्यक्ति भगवान की कृपा को स्वीकार करता है, वह अंततः उनके धाम को प्राप्त करता है।
भक्त का अन्त कल्याणमय है।
२. विष्णु पुराण (१.१९.२०)
वासुदेवपरायणाः न ते याति पराभवम्।
अर्थ: जो वासुदेव के आश्रित हैं, वे कभी पराभव (पराजय/विनाश) को प्राप्त नहीं होते।
यह सीधे-सीधे “न रिष्यति त्वावतः सखा” के भाव का समर्थन है।
३. पद्म पुराण--
स्मरणाद् विष्णोः सर्वदुःखक्षयो भवेत्।
अर्थ: विष्णु के स्मरण मात्र से सभी दुःखों का नाश हो जाता है।
भक्त का दुःख और अनर्थ नष्ट हो जाता है।
४. शिव पुराण--
महादेवभक्तो न प्रणश्यति कदाचन।
भावार्थ: महादेव का भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
५. देवी भागवत पुराण--
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता…
तस्याः शरणं गच्छन्ति ते नश्यन्ति न कर्हिचित्।
भावार्थ: जो देवी की शरण में जाते हैं, वे कभी नष्ट नहीं होते।
निष्कर्ष--
पुराणों का स्पष्ट सिद्धान्त है—
ईश्वर-परायण व्यक्ति निर्भय होता है। शरणागत भक्त का पराभव नहीं होता।
स्मरण, भक्ति और आश्रय से दुःख और विनाश का अंत होता है।
अतः ऋग्वेद का वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
पुराणों द्वारा पूर्णतः समर्थित है।
"ईश्वर का भक्त / सखा नष्ट नहीं होता” —
इस सिद्धान्त की स्पष्ट पुष्टि भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. गीता-- ९.३१
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
अर्थ: वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त करता है।
हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक कह दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
यह “न रिष्यति त्वावतः सखा” का प्रत्यक्ष समर्थन है।
२. गीता-- ६.४०
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥
अर्थ: हे पार्थ! न इस लोक में, न परलोक में उसका विनाश होता है;
कल्याण करने वाला कभी दुर्गत को प्राप्त नहीं होता।
३. गीता-- १८.६६
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थ: सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ;
मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा—शोक मत करो।
शरणागति = सुरक्षा और मोक्ष।
४. गीता-- ९.२२
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अर्थ: जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हैं,
उनके योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
५. गीता-- १२.६–७
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः…
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युंसंसारसागरात्॥
अर्थ: जो मुझे परम मानकर मेरे आश्रित हैं,
मैं उन्हें मृत्यु-संसार-सागर से शीघ्र उबार लेता हूँ।
समन्वित निष्कर्ष
गीता का सिद्धान्त स्पष्ट है—
भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
शरणागत की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
ईश्वर-आश्रित व्यक्ति दुर्गत को प्राप्त नहीं होता।
इस प्रकार ऋग्वेद का वाक्य —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
गीता द्वारा प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप से समर्थित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि महाभारत में अनेक स्थानों पर मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. शान्ति पर्व (नारायणीय उपाख्यान)
नारायणपरायणो न कुतश्चित् पराभवम्।
भावार्थ: जो नारायण-परायण है, वह कभी पराभव (पराजय/विनाश) को प्राप्त नहीं होता।
यह “न रिष्यति त्वावतः सखा” के समानार्थक है।
२. उद्योग पर्व--
यतो धर्मस्ततो जयः।
अर्थ: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
जो धर्म (ईश्वर) के पक्ष में है, उसका नाश नहीं होता।
३. भीष्म पर्व-- (गीता प्रसंग का ही आधार)
मच्चित्ताः मद्गतप्राणाः…
(यहाँ भक्तों की ईश्वर में स्थित अवस्था का वर्णन है।)
४. वन पर्व-- (द्रौपदी प्रसंग)
द्रौपदी जब संकट में भगवान को पुकारती हैं, तब उनकी रक्षा होती है।
संदेश स्पष्ट है—ईश्वर-आश्रित का अन्ततः संरक्षण होता है।
५. शान्ति पर्व--
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है;
धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा संरक्षित होता है।
जो धर्म (ईश्वर-मार्ग) की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट सिद्धान्त है—
धर्म और ईश्वर का आश्रित पराभव को प्राप्त नहीं होता।
शरणागत की रक्षा होती है।
धर्म की रक्षा करने वाला स्वयं सुरक्षित रहता है।
अतः ऋग्वेद का वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
महाभारत द्वारा पूर्णतः समर्थित है।
इस सिद्धान्त की पुष्टि नीति-ग्रन्थों में भी स्पष्ट मिलती है। प्रमाण सहित प्रस्तुत है:
१. चाणक्य नीति--
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।
अर्थ: धर्म से रहित मनुष्य पशु के समान है।
जो धर्मयुक्त है, वही श्रेष्ठ और सुरक्षित है।
धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्माश्रित का नाश नहीं होता।
२. नीतिशतक (भर्तृहरि)
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥
अर्थ: नीति-ज्ञ लोग निन्दा करें या स्तुति; लक्ष्मी आए या जाए; मृत्यु आज हो या युगान्त में—
धीर पुरुष न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते।
जो धर्ममार्ग पर स्थित है, उसका अन्ततः कल्याण ही होता है।
३. विदुर नीति--
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्…
और एक प्रसिद्ध नीति-वाक्य:
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
(यह भाव विदुर-नीति में भी प्रतिपादित है।)
अर्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है;
धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा सुरक्षित रहता है।
चाणक्य, भर्तृहरि और विदुर--इन सभी नीतियों का एक ही निष्कर्ष है—
धर्म ही वास्तविक रक्षक है।
धर्ममार्ग पर स्थित व्यक्ति अन्ततः सुरक्षित रहता है।
अधर्म ही विनाश का कारण है।
इसके समर्थन में अब अन्य आर्ष ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. हितोपदेश--
धर्मेण जयते लोकः धर्मेण जयते परः।
धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ: धर्म से ही लोक में विजय मिलती है;
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
२. पंचतंत्र--
न धर्मो विद्यते तत्र न सत्यं नापि सौहृदम्।
अर्थ--
जहाँ धर्म नहीं, वहाँ सत्य और मित्रता भी नहीं।)
स्पष्ट है—धर्म ही स्थायी संरक्षण का आधार है।
३. मनुस्मृति (८.१५)
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
अर्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है;
धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा सुरक्षित रहता है।
४. याज्ञवल्क्य स्मृति--
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।
अर्थ: धर्म से अर्थ और सुख की प्राप्ति होती है।
धर्माश्रित जीवन ही कल्याणकारी है।
५. योगवशिष्ठ--
चित्तमेव हि संसारः तेन त्यक्तं भवेद्भवः।
भावार्थ: जब चित्त ईश्वर में स्थित होता है, तब संसार-बन्धन समाप्त हो जाता है।
ईश्वराश्रित पुरुष विनाश और बन्धन से परे हो जाता है।
६. वाल्मीकि रामायण--
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
(युद्धकाण्ड)
अर्थ: जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहता है “मैं आपका हूँ”,
उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।
शरणागत की रक्षा निश्चित है।
समाहार निष्कर्ष
सभी आर्ष ग्रन्थों का एकमत सिद्धान्त है—
धर्म ही रक्षक है।
ईश्वर-शरणागत को अभय मिलता है।
भक्त या धर्माश्रित व्यक्ति का अन्ततः पराभव नहीं होता।
इस प्रकार ऋग्वेद का वचन —
“न रिष्यति त्वावतः सखा” (ऋग्वेद १/११/८) —
वेद, उपनिषद, गीता, पुराण, महाभारत तथा समस्त नीति-ग्रन्थों द्वारा पूर्णतः समर्थित सिद्ध होता है।
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