अहंकार का रथ:
रण-भूमि में खड़ा धनुर्धर, गांडीव हाथ में ताने,
कर्ण और अर्जुन भिड़े परस्पर, मृत्यु न किसी की माने।
कर्ण मारता बाण वेग से, रथ दस हाथ हट जाता,
अर्जुन के प्रहार से तो, रथ कोसों पीछे जाता।
हँसकर बोला पार्थ कृष्ण से, "देखो मेरा जोर,
कर्ण खिसक गया पंद्रह हाथ, मचा युद्ध में शोर।
मेरा रथ तो टस से मस, बस दस हाथ ही हुआ,
क्या सूतपुत्र के बाणों में, बस इतना बल ही मुआ?"
मुस्कुराए त्रिलोकी तब, बोले— "सुन लो पार्थ,
व्यर्थ कर रहे हो तुम जग में, अपना ये पुरुषार्थ।
जिस रथ पर कपिराज स्वयं, हैं ध्वजा थाम कर बैठे,
शेषनाग ने थामे पहिए, क्यों तुम इतना ऐंठे?"
"स्वयं चराचर का जो स्वामी, सारथी बना खड़ा है,
उस रथ को जो दस हाथ हटा दे, वो योद्धा बड़ा है।
अगर न होते हम इस पर, तो ब्रह्मांड पार तुम होते,
कर्ण के केवल एक बाण से, तुम जीवन अपना खोते।"
टूटा तब अभिमान पार्थ का, नयनों में जल आया,
वीर कर्ण के चरणों में, उसने अपना शीश झुकाया।
कहे 'आशीष' पुकार के, तज दे तू अभिमान,
सत्य वही जो कृष्ण कहें, और विमल कर दे ज्ञान।
Adv. आशीष जैन
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