Hindi Quote in News by Sonu Kumar

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प्रश्न : मैं राईट टू रिकॉल पार्टी से वोट वापसी पासबुक के मुद्दे पर चुनाव क्यों लड़ रहा और क्यों युवाओं को अधिक से अधिक राजनीति के क्षेत्र में जाना चाहिए?

उत्तर :
स्थापित राजनैतिक पार्टियाँ चाहती है कि कम से कम युवा चुनावों में हिस्सा ले। यदि ज्यादा लोग चुनावों में आयेंगे तो इनमे ईमानदार / समर्पित / काबिल लोग भी होंगे, और धीरे धीरे मतदाताओ के विकल्प बढ़ने लगेंगे। और विकल्प बढ़ने से बदतर लोगो को चुनौती मिलेगी। पूरी राजनीती कार्यकर्ताओ का टाइम पास करने और उन्हें विकल्प मुहैया नहीं कराने पर चलती है। यदि लोगो को अच्छे विकल्प मिलने लगेंगे तो धीरे धीरे वे या तो बुरे उम्मीदवारों को मैदान से बाहर कर देंगे, या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे।

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इसे फिर से पढ़े : या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे।

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कैसे ?

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मान लीजिये कि, भारत में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बैंको का एनपीए, सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल की समस्या है और कोई भी पार्टी इसे मुख्य मुद्दा बनाने को तैयार नहीं है। मान लीजिये कि किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते है और इन मुद्दों को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हुए किसी विधानसभा से 20 छोटे उम्मीदवार नामंकन दाखिल करते है। तो उस विधानसभा क्षेत्र में चुनावों के दौरान गरीबी / भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुखता से छा जाएगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार पर चुनाव प्रचार के दौरान यह दबाव बनेगा कि वह इस पर कोई स्टेंड ले।

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यदि वह कोई स्टेंड नहीं लेता है तो जनता के सामने वह एक्सपोज होने लगेगा और जनता देखेगी कि बड़ी पार्टियो के उम्मीदवार इन पर बोल नहीं रहे है। इससे उस पर दबाव बनेगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार को इस मुद्दे को एड्रेस करना पड़ेगा। और जैसे ही एक बड़ी पार्टी का उम्मीदवार इसे एड्रेस करता है, वैसे ही अन्य बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों को भी इसे एड्रेस करना पड़ेगा। और इस तरह यह मुद्दा उभरकर आ जाएगा। और अब इसे पेड मीडिया को भी रिपोर्ट करना पड़ेगा !!

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और यदि ऐसा 50 विधानसभाओ में होता है तो ये मुद्दे पूरे राज्य में उछलकर आ जायेंगे। लेकिन यदि कोई भी उम्मीदवार इन मुद्दों को लेकर चुनाव में नहीं आएगा तो जनता के पास सिर्फ बड़ी पार्टियों के रूप में 2–3 विकल्प रहेंगे। अत: उनमे से कोई भी इन मुद्दों पर नहीं बोलेगा, और वे पब्लिक का खून गरम करने वाले भाषण देंगे, और सभी बड़ी पार्टियों के उम्मीदवार ऐसा ही करेंगे। इस तरह जब चुनाव में कम विकल्प होते है, तो जनता असहाय हो जाती है। लेकिन यदि कई छोटे छोटे कार्यकर्ता सही मुद्दों पर चुनावों में आ जाते है तो बड़ी पार्टियों को सही मुद्दों को उठाने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

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क्योंकि नेता आपकी बात सिर्फ चुनाव में ही सुनता है, इसके अलावा अगले 5 साल तक कुछ भी बोलते रहिये, वह सुनने का सिर्फ नाटक करता है, लेकिन सुनता नहीं है। लेकिन चुनावों के दौरान नेताओं के कान निकल आते है, और वे सुनना शुरू करते है। तो यदि आप नेता की तवज्जो चाहते है तो आपको चुनाव के दिनों में ही अपनी बात कहनी चाहिए। और चुनावो के दौरान जनता इस मोड में रहती है कि उन्हें सिर्फ उम्मीदवार को ही सुनना होता है। ऐसे में यदि आप उम्मीदवार है, तो जनता भी आपको सुनेगी और नेता भी सुनेगा !!

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मेरा अब तक जो अनुभव रहा है उस आधार पर मैं कह सकता हूँ कि, भारत में दो काम करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यो की श्रेणी में आते है :

खुद के कमाए गए पैसे से जमीन खरीदकर बिना किसी लोन के छोटी मोटी मनुफेक्चरिंग यूनिट लगाना
किसी छोटी पार्टी से या निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सांसद / विधायक का चुनाव लड़ना।
युद्ध (War) सबसे बेहतर शिक्षक है। युद्ध जो चीजे सिखाता है, उसे दुनिया में और किसी भी तरह से सीखा नहीं जा सकता। इस तरह युद्ध सबसे बेहतरीन शिक्षक है। युद्ध के बाद शांति काल के सबसे बेहतर 2 शिक्षक ऊपर दिए गए है। ये तीनो शिक्षक सबसे श्रेष्ठ इसीलिए है, क्योंकि इसे किताबों को पढ़कर सीखा नहीं जा सकता। इसके लिए मैदान में उतरना पड़ता है।

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(A)

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अच्छे और काबिल लोग चुनावों में हिस्सा ना ले और राजनीती से दूर रहे इसके लिए उन्होंने कितने सारे गलत क़ानून छापें हुए है, इस विषय पर मैं 100 पेज की पोस्ट लिखूंगा तो भी यह विषय पूरी तरह कवर नहीं कर पाऊंगा। लेकिन राजनीती को जितना मैंने अब तक समझा है उसका पूरा निचोड़ मुझसे पुछा जाए तो मैं कहूँगा कि पूरी राजनीती के डिजाइन का केन्द्रीय उद्देश्य यह है कि - युवाओं को राजनीती में आने से हतोत्साहित किया जाए !!

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वे सिर्फ वोटर चाहते है, राजनैतिक कार्यकर्ता नहीं। एक वोटर वह है जो व्यवस्था में वांछित बदलाव के लिए नेता से उम्मीद करता है। जबकि एक कार्यकर्ता वह है जो अमुक आवश्यक बदलाव के लिए तब स्वयं चुनावों में हिस्सा लेता है, जब अन्य कोई व्यक्ति अमुक मुद्दे पर मैदान में आने को तैयार न हो।

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युवाओं को राजनीति में आने से रोकने के लिए पेड मीडिया निरंतर काम करता है। और वह यह कैसे करता है, इसे समझाने का मेरे पास कोई शोर्ट कट नहीं है। इसे समझने का तरीका सिर्फ यह है कि, आप खुद चुनाव लड़ें। जब तक आप चुनाव नहीं लड़ते तब तक आप इस बात को कभी भी समझ नहीं पायेंगे कि उन्होंने कैसे आपको चुनाव लड़ने से रोका हुआ है। दरअसल चुनाव लड़ने में सबसे बड़ी बाधा वास्तविक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक है।

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पेड मीडियाकर्मियों ने चुनाव लड़ने वालो के खिलाफ समाज में किस तरह का जहर घोला हुआ है, इसका पता आपको तब चलता है, जब आप चुनाव लड़ने का फैसला करते है। और जैसे ही आप यह फैसला लेते है आपके परिवार वालो से लेकर मित्र, रिश्तेदार, अड़ोसी-पडौसी आपको ऐसी नजरो से देखने लगते है जैसे आप कोई निहायत ही फालतू / निकृष्ट / अनुत्पादक कर्म करने जा रहे है।

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ज्यादातर लोग आपका मजाक उड़ायेंगे, ताने कसेंगे और तरह तरह के तंज सुनाकर आपको हतोत्साहित करेंगे। हालांकि उन्हें आपको रोकने से कोई जाती फायदा नहीं होने वाला है। लेकिन पेड मीडिया ने सब तरफ से माहौल ही इस तरह का बनाया हुआ है कि ज्यादातर लोग इसी तरह से पेश आते है। तो सबसे पहले आपको इस मनोवैज्ञानिक लड़ाई से पार पाना होता है, और पिछले 5 साल में मेरा अनुभव है कि 99.9999% लोग इस पहली बाधा को ही पार नहीं कर पाते।

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जो लोग यह सलाह देते है कि युवाओं को राजनीती में नहीं जाना चाहिए, मैं उनसे कहता हूँ कि यदि राजनीती गटर है तो आप वोट क्यों करते है, राजनीती पर टिप्पणियाँ एवं विमर्श क्यों करते है !! मतलब राजनीती पर बहस करना, राजनैतिक टिप्पणियाँ करना, नीतियों पर बहस करना, विभिन्न समस्याओ के लिए राजनेताओ को कोसना और सोशल मीडिया पर राजनीती पर बवाल काटना एक रचनात्मक काम है, लेकिन चुनाव लड़ना एक बदतर गतिविधि है !!

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और यदि राजनीती गन्दी है तो इसकी वजह यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को राजनीती में जाने से हतोत्साहित किया जाता है। इससे जनता के पास बेहद बेहद सीमित विकल्प रह जाते है, और उन्हें उन बदतर विकल्पों में से ही किसी को चुनना होता है !! और फिर यही लोग कहते है कि राजनीती में अच्छे लोगो की कमी है। यह एकदम सीधी बात है कि, यदि आप लोगो को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करोगे तभी तो ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे, और जब ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे तो उनमे अच्छे लोग भी होंगे।

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टीवी चेनल्स पर या अखबारों में आपने कई बार इस आशय की बात पढ़ी-सुनी-देखी होगी जिसमें यह बार बार दोहराया जाता है कि एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपको वोट करना चाहिए, और सोच समझकर वोट करना चाहिए।

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लेकिन क्या आपने अख़बार-टीवी पर कितने बुद्धिजीवियों को यह कहते सुना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को चुनाव लड़ना चाहिए ताकि मतदाताओ के पास ज्यादा विकल्प हो ? शायद आज तक आपने ऐसा वाक्य कभी भी पेड मिडिया में नहीं सुना होगा !! वे कभी कभार यह कह देंगे कि अच्छे लोगो को आगे आना चाहिए, राजनीती में रुचि लेनी चाहिए, अच्छे उम्मीदवारों को वोट करना चाहिए आदि आदि। लेकिन यह बात कभी भी नहीं कहेंगे कि - यदि आपको राजनीति में सुधार लाना है तो ज्यादा से ज्यादा लोगो को अच्छे मुद्दों को उठाने के लिए चुनाव लड़ने चाहिए !!

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वे कहेंगे राजनीती गटर है, और इससे दूर रहो !! बस !! सोशल मीडिया पर बामा बूम करो, यू ट्यूब पर वीडियो बनाकर अपलोड करो, धरने दो, विरोध करो, समर्थन करो और राजनीति के नाम पर जो मर्जी करो पर चुनाव मत लड़ो !!

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(B)
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चुनाव लड़ना राजनीती में सबसे ज्यादा गंभीर गतिविधि है, और एक्टिविज्म में मेरा एक मुख्य लक्ष्य भारत के ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना है। और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है। मैं बस उन तक यह बात पहुंचा देना चाहता हूँ कि यदि वे वाकयी व्यवस्था में बेहतर बदलाव चाहते है तो जब तक वे चुनावो में नहीं आते तब तक बात बनने वाली नहीं है। कृपया इस बात को नोट करें कि मेरा यह कहना नागरिको से नहीं बल्कि राजनैतिक कार्यकर्ताओ से है। राजनैतिक कार्यकर्ता वे है जो राजनैतिक विषयों पर टीका करते है, जिनके विमर्श में राजनैतिक दृष्टिकोण प्रकट होता है।

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मैं बहुधा जूरी कोर्ट के बारे में लिखता हूँ। जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने में व्यक्ति को 2 -3 घंटे का समय लगता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति आकर मुझसे कहता है कि वह देश के लिए राजनैतिक सन्दर्भ में 3 घंटे काम करने के लिए उपलब्ध है, तो मैं उससे जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने के लिए नहीं कहूँगा। मैं उससे कहूँगा कि वह चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर विधायक का फॉर्म डाउलोड करे और इस डमी फॉर्म को भरे। और फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति चुनाव लड़ता है या नहीं।

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क्योंकि मेरे मानने में चुनाव का फॉर्म भरना भी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गतिविधि है। और यह इतनी महत्त्वपूर्ण है कि मैं इसे ड्राफ्ट पढने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। और चुनाव लड़ना तो खैर सबसे महत्त्वपूर्ण है ही।

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यदि आप चुनाव लड़ने इच्छुक है और इसमें आपको यदि किसी भी प्रकार की जानकारी या सहयोग चाहिए तो मुझसे राब्ता कर सकते है। अपनी तमाम व्यस्तताओ के बावजूद मैं आपको यथा शक्ति सहयोग करूँगा। और कृपया इस बात को नोट करें कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप मेरे द्वारा सुझाए गए मुद्दों पर चुनाव लड़ते है या खुद के मुद्दों पर चुनाव लड़ते है। आप चुनाव लड़ रहे है, यह भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है। तो आप किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ें या निर्दलीय भी चुनाव लड़ रहे तो मुझे सहयोग करने में ख़ुशी होगी।

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मैंने अब तब दो चुनाव लड़े है। एक बार विधायक का और एक बार सांसद का।
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चुनाव का बजट - विधायक का चुनाव 20 हजार के बजट में आसानी से लड़ा जा सकता है। पाठक ध्यान दें कि चुनाव जीतने के लिए आपको कम से 25-30 करोड़ की जरूरत होती है। लेकिन मैं यहाँ चुनाव लड़ने की बात कर रहा हूँ, चुनाव जीतने की नहीं। तो यदि आप 20 हजार रुपया वहन कर सकते है तो चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य करें। इसके लिए आपको एक सहयोगी की भी जरूरत होगी, ताकि पर्चे छपवाने, फ़ार्म भरने आदि में वो आपका सहयोग कर सके। तो यदि आपका साथ देने के लिए 1 भी आदमी तैयार है तो आप चुनाव लड़ सकते है।

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(C)

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चुनाव लड़ने से सम्बंधित कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी :

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चुनाव लड़ने में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम है नामांकन भरना। और यह बहुत बहुत महत्त्वपूर्ण काम है। यदि आपने सही तरीके से अपना नामांकन भर दिया तो समझिये आधी लड़ाई जीत ली है। तो यदि आप भविष्य में कभी भी चुनाव लड़ना चाहते है तो सबसे पहला काम यह है कि आप तुरंत चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर फॉर्म डाउनलोड करें, और इसे भरकर अपने पास रख ले।
मान लीजिये कि आपको 2 साल बाद आने वाला चुनाव लड़ना है। तो भी 2 साल पहले ही नामांकन भर कर रख ले। नामांकन भरने के कोई पैसे नहीं लगते है। यह मुफ्त में डाउनलोड होता है। अत: आप इसका प्रिंट आउट ले ले और भरकर अपने पास रख ले। जब चुनाव आयेंगे तब इस बारे में अंतिम फैसला करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं। यदि नहीं लड़ना है तब भी नामांकन तो भर कर रख ले। और फिर जब चुनावी अधिसूचना निकलेगी तब आपको यदि चुनाव लड़ना है तो चुनाव आयोग में जाकर ओरिजिनल फॉर्म ले आये और पहले से भर कर रखे गए अपने फॉर्म से नकल कर ले।
नामांकन फॉर्म बहुत ही जटिल होता है। मैंने अपने जीवन में इतना जटिल दस्तावेज दूसरा नहीं देखा है। और इसे जानबूझकर बहुत जटिल बनाया गया है। ज्यादातर लोग इसे गलत भर देते है और उनका फॉर्म रिजेक्ट हो जाता है। मुझे इसे भरने में पूरे 7 दिन लगे थे, और फॉर्म आने और इसे जमा करने के लिए सिर्फ 7 दिन की टाइम विंडो ही मिलती है। इस तरह मैंने अंतिम दिन के अंतिम दिन घंटे में अपना फॉर्म जमा कराया।
यदि आपने पहले से नामांकन फॉर्म नहीं भरा है तो आपको वकील के पास दौड़ लगानी होगी। वकील आपको सीधे 25 हजार की फ़ीस सुनाएगा, और इस तरह आपका 25 हजार वेस्ट हो जाएगा। बड़ी पार्टियों के फॉर्म पेशेवर वकील भरते है। लेकिन हम छोटे उम्मीदवार है, अत: हमें अपना फॉर्म खुद ही भरना पड़ेगा, और इसीलिए हमें ज्यादा वक्त चाहिए। इसीलिए मैं कहता हूँ कि पहला स्टेप है डमी फॉर्म भरकर अपने पास रखना। और इस बात का फैसला बाद में करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं।
मेरे चुनाव प्रचार में सिर्फ पेम्पलेट होता है। न कोई कार्यालय, न कोई टेम्पू, न बैनर, न विज्ञापन। मैं बस पेम्पलेट छपवाकर बाँट देता हूँ। आप भी ऐसा ही कर सकते है। 1 दिन पेम्पलेट छपाने में लगेगा, और 2 दिन बांटने में। बस और कुछ नहीं करना है। ज्यादा लोड लेना हो तो आपकी इच्छा है। मेरे हिसाब से इतना करना काफी होता है। 1 दिन नामांकन भरने में और 3 दिन पेम्पलेट के। आपको 4 दिन चाहिए होते है। यदि आपके साथ कोई सहयोगी है तो पेम्पलेट का काम 1 दिन में भी हो सकता है। इस तरह आप 2 दिन और 20 हजार खर्च करके चुनाव लड़ सकते है।
यदि आप महाराष्ट्र एवं हरियाणा के निवासी है तो मालूम हो कि 4 अक्टूबर नामांकन भरने की अंतिम तिथि है। अत: आप यह चुनाव भी लड़ सकते है। यदि आप अन्य राज्यों के निवासी है तो भी नामांकन भरकर रखे ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में आप चुनाव लड़ सके।

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राजनीति को देखने के दो दृष्टीकोण है :

वोटर का दृष्टिकोण , और
उम्मीदवार का दृष्टिकोण।
यदि आप चुनाव लड़ लेते है तो आपको राजनीति को समझने का एक और दृष्टिकोण मिलेगा। और यह दृष्टिकोण वाकयी महत्त्वपूर्ण है। अत: मेरा मानना है कि एक राजनैतिक कार्यकर्ता को विधायक या सांसद का चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य चाहिए, ताकि वह राजनीति के उन पहलूओ को देख सके, जिसे ज्यादातर लोग नहीं देख पाते। और इस बात से कभी फर्क नहीं पड़ता कि आपको कितने वोट मिले है।

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(D)

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गैर राजनेतिक संगठन बनाकर राजनैतिक मुद्दों पर काम करना दुनिया की सबसे गन्दे किस्म की राजनीति है ।

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राजनीति को सत्ता के लालच से जोड़ कर देखा जाता है, इसीलिए अपना नैतिक मापदंड बनाए रखने के लिए कई संघठन गैर राजनेतिक गतिविधियाँ संचालित करते है, लेकिन उनके लक्ष्य हमेशा राजनेतिक होते है । अवाम में राजनेतिक विवेक पनपने से राजनेतिक सत्ताओ को चुनोती मिल सकती है, इसलिए कार्यकर्ताओं का टाइम पास करने के लिए उन्हें निस्वार्थ सेवा के ऊँचे आदर्श में उलझा दिया जाता है ।

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राजनेतिक दल पेड मीडिया, पेड बुद्धिजीवीयों, पेड स्तंभकारो, पेड पाठ्य पुस्तक लेखको की सहायता से आम जन के राजनेतिक विवेक को परिपक्व करने वाली सूचनाओं को बाधित कर देते है। इससे शासको के लिए शासन करना आसान हो जाता है ।

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उदाहरण 1 : जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के बाद देश की अवाम में भारी असंतोष पनपने लगा था। महात्मा लाला लाजपत राय, और महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल के नेतृत्व में महात्मा भगत सिंह, महात्मा चन्द्र शेखर आज़ाद, महात्मा बटुकेश्वर दत्त तथा महात्मा राजगुरु जैसे हज़ारो युवाओ का मोहन गांधी से मोहभंग हुआ, और युवा राजनेतिक गतिविधियों में रूचि लेने लगे । ये क्रांतिकारी राईट टू रिकाल कानूनों और पूर्ण स्वराज्य की मांग कर रहे थे । इनकी बढ़ती लोकप्रियता लाखो युवाओं में राजनेतिक विवेक का संचार कर सकती थी ।

निदान : अंग्रेजो के निर्देश पर जवाहर लाल और मोहन गांधी ने 1924 में 'सेवा दल' की स्थापना की । इस दल के कार्यकर्ताओं को राजनेतिक गतिविधियों में भाग न लेने की शपथ दिलाई गयी ।
सेवा दल ने लाखो कार्यकर्ताओं को सुबह व्यायाम करने, जन जागरण और समाज सेवा जैसे अनुपयोगी कार्यो में इसीलिए उलझा दिया ताकि, कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट हो जाए, और पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले क्रान्तिकारियो को कार्यकर्ता नही मिल सके ।

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उदाहरण 2 : 1922, तुर्की के खिलाफत आन्दोलन के दौरान मोहन गांधी आज़ादी की लड़ाई को हाशिये पर धकेल कर खिलाफत आन्दोलन में कूद गए थे । यह वाकयी में एक अजीब स्थिति थी। मोहन के इस कदम से हिन्दू नाराज हुए और हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण होने लगा ।

इसी दौरान अखिल भारतीय हिन्दू महासभा नामक राजनेतिक संघठन खड़ा हो रहा था और उनके एजेंडे में चुनाव लड़ना भी शामिल था। यदि ऐसा होता तो मोहन गांधी और जवाहर लाल का युवाओं को चरखे, बकरी का दूध, खादी, भजन, अनशन और साफ़ सफाई में उलझाए रखने का कार्यक्रम खटाई में पड़ सकता था, जिस से ब्रिटिश साम्राज्य को नुकसान होता। ब्रिटिश भारत के युवाओं को सक्रीय राजनीती में नही आने देना चाहते थे।

निदान : अंग्रेजो की अनुमति से सिंधिया राजवंश ने एक छद्म हिन्दू वादी अराजनेतिक संगठन 'X' को खड़ा करने के लिए धन मुहैया कराया, ताकि हिन्दू महासभा को तोड़ा जा सके ।
संघठन X ने सिंधिया तथा अन्य देशी राजाओं से प्राप्त चंदो से लाखो हिन्दू कार्यकर्ताओं को खींच कर परेड करने, लाठी चलाना सीखने , राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ध्वज वंदन करने और नारे लगाने जैसे अनुपयोगी और अराजनैतिक कार्यो में उलझा लिया। हिन्दू महासभा को कार्यकर्ता और चंदे मिलने बंद हो गए, और यह संघठन टूट गया। चूंकि हिन्दू महासभा राजनेतिक लक्ष्यों के लिए नागरिको को संघठित कर रही थी, इसलिए इनके नेता हमेशा अंग्रेजो के निशाने पर रहे ।

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इस समय भारत एक अजीब स्थिति से गुजर रहा था, जिसमे एक और मोहन और जवाहर युवाओं को अनशन और चरखे से जबकि X परेड और लाठियों से आज़ादी लाने का विश्वास दिला रहे थे ( और दिला भी चुके थे), वही दूसरी और देश में कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रहे राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस देश से बाहर जाकर कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा कर के दुनिया की सबसे ताकतवर सेना से लड़ने के लिए फ़ौज खड़ी कर रहे थे।

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उदाहरण 3 : आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रणेता महात्मा राजीव भाई दिक्षित 1985 से ही स्वदेशी का प्रचार कर रहे थे । पिछले 70 वर्ष में वो अकेले शख्स है जिन्होंने लाखों कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण सूचनाएं दी । व्यवस्था परिवर्तन के तथा विदेशी शासको से भारत की मुक्ति के लिए वो पूरे देश में घूम घूम कर 25 वर्ष तक राजनेतिक जन आन्दोलन की जमीन तैयार करते रहे । उन्होंने लाखों नागरिको को FDI के दुष्प्रभाव से परिचित कराया कि, कैसे FDI जनित विकास भारत को फिर से ग़ुलाम बना देगा ।

निदान : चूंकि राजीव भाई राजनेतिक आन्दोलन खड़ा कर रहे थे, अत: इसे तोड़ने के लिए आरएसएस ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। आरएसएस, बीजेपी और धनिको से प्राप्त सरंक्षण और अनुदान से स्वदेशी जागरण मंच ने लाखों कार्यकर्ताओं को अपनी और खींचा और बीजेपी को सत्ता हासिल हुयी, 1999 में सत्ता में आते ही बीजेपी ने स्वदेशी के मुद्दों को दरकिनार कर दिया ।
ज़्यादातर बड़े समाज सेवी संघठन सत्ता में सेंध लगाने का ही कार्य करते है । यह कोयले की दलाली के बावजूद हाथ काले न होने देने का एक पैंतरा है । ये भारी भरकम गैर राजनेतिक संघठन समाज सेवा के नाम पर लाखो करोड़ो कार्यकर्ताओं को आकर्षित करते है, तथा उनकी मदद से परोक्ष राजनेतिक ताकत हासिल करते है । इसमें फायदा यह होता है, कि राजनेतिक दल इन अराजनेतिक संघठनो के भ्रमित कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह नही रहता, तथा इन संघठनो के पास हमेशा बच निकलने की यह पतली गली रहती है कि अमुक राजनेतिक दल उनकी उम्मीदों पर खरा नही उतरा। इस प्रकार ये अराजनैतिक संघठन अमरये बकरे बने रहते है ।

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बड़े संघठनो के अलावा इसी तासीर के हज़ारो अराजनैतिक संघठन देश में संचालित है, जिनका एकनिष्ठ उद्धेश्य नागरिको या धनिको से चंदा लेकर कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करना होता है, ताकि उन्हें सक्रीय राजनीति में आने से रोका जा सके। आपको किसी भी जिले में इस तबियत के सैंकड़ो छोटे मोटे संगठन मिल जायेंगे जिनका मॉडल कुछ इस तरह का होता है :

इनकी जिले स्तर पर एक कार्यकारिणी होती है, जिसमे 10-20 सदस्य/पदाधिकारी होते है।
इन अध्यक्षों / उपाध्यक्षो/ सचिवो / कोषाध्यक्षो आदि नामधन्य पदाधिकारियों के हाथ जोड़ते हुए से फोटो वगेरह आप अखबारों और शहर के मुख्य चौराहों पर चस्पां हुए देख सकते है।
वक्त जरुरत इन पदाधिकारियो द्वारा कार्यकर्ताओं का टाइम खपाने एवं संघठन से चिपकाये रखने के लिए एक सभा रखी जाती है, जिसके प्रारम्भ मालाएं और साफे पहनाने तथा समापन संघठन में ही शक्ति है टाइप के नारो से होती है। अमूमन सभा के मध्य में चाय, बिस्किट, समोसो आदि के सिवाय कोई तार्किक एजेंडा नही होता, अत: गाहे बगाहे समस्या के समाधान सुझाने की जगह सिद्धांतो की रूटीन भाषण बाज़ी कर इति कर ली जाती है ।
कार्यकर्ताओं को व्यस्त रखने के लिए ये संगठन रक्तदान शिविर लगाना, भोजन वगेरह बांटना, पेड़ लगाना, जयंतिया मनाना, प्याऊ चलवाना, नये मेंबर बनवाना, भभका पैदा करने के लिए नारों के साथ जुलुस और वाहन रेली निकालना आदि तथा इसी तरह की फौरी गतिविधियाँ संचालित करते है ।
अमूमन इस प्रकार के सभी संगठन कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सूचनाये नही देते, और उन्हें राजनीती से दूर रहने की घुट्टी देते रहते है।

इनका मुख्य डायलॉग होता है, यहाँ राजनीती मत करो, राजनीती गन्दी चीज है, आदि आदि !!

पेड मीडिया में इस तरह के बड़े अराजनैतिक संगठन चलाने वालो को काफी सकारात्मक कवरेज दिया जाता है, और उनके इस अराजनैतिक पने को एक खासियत की तरह उभारा जाता है कि, देखो ये लोग कितने निस्वार्थ है कि राजनीति की गंदगी से दूर रहकर सेवा का कार्य कर रहे है !!

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कुल मिलाकर, उन्होंने लोगो को राजनीति में जाने से रोकने के लिए काफी अच्छा सेट अप लगाया हुआ है !!

मैं यह लेख पढ़ने वाले से पूछना चाहता हूं की क्या आप भारत देश की समस्याओं को सुलझाने में देश की उन्नति में अपना योगदान देना चाहते हैं तो कृपया आप अपनी बात राजनीति में सक्रिय योगदान देकर अपनी बात जनता के सम्मुख प्रमुखता से रखें बहुत सी राजनीतिक पार्टियों हैं आप उन पार्टियों से टिकट लेकर या निर्दलीय चुनाव लड़े अगर आप एक मंच चाहते हैं और चुनाव लड़ना चाहते हैं तो कृपया निम्नलिखित नंबरों पर व्हाट्सएप करें हम आपको टिकट भी देंगे आपका नामांकन फार्म भी भरवाने में मदद करेंगे और अपनी क्षमता अनुसार फाइनेंशियल सहयोग भी प्रदान करेंगे आने वाले विधानसभा चुनाव असम बंगाल तथा कई छोटे राज्यों में 2026 में चुनाव होने की प्रबल संभावना है इच्छुक कार्यकर्ता देशहित में चुनाव लड़ने के लिए संपर्क कर सकते हैं.

शिव प्रसाद गुप्ता 7007184869
महावीर प्रसाद कुमावत 9887742837

Hindi News by Sonu Kumar : 112014256
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