किसे मिल गया यह गणतंत्र?
और किसके दरवाज़े पर आज भी 'नाम' का पहरा है?
2026 की दहलीज़ पर खड़ा होकर भी,
अगर कोई आज भी 'हाशिए' की बेड़ियों में कैद है,
तो समानता के ये सारे उत्सव... महज़ एक रस्म हैं, एक अधूरा सपना हैं।
उन पुरखों के संघर्षों को सिर्फ मालाओं में न बांधो,
उनके उन सवालों को ज़िंदा करो, जो आज भी जवाब माँगते हैं।
क्योंकि जब तक न्याय की चौखट सबके लिए एक समान नहीं,
तब तक यह गणतंत्र प्यासा है... और हमारा चुप रहना, इस प्यास को बढ़ाने जैसा है।"