*क्यों चुनावो में पार्टी के उम्मीदवारों को ही विजय मिलती है और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाती है, और कैसे यह व्यवस्था लोकतंत्र का गला दबाकर राजनीति में कुछ परिवारों का दबदबा बनाए रखती है, और कैसे इस समस्या को हल किया जा सकता है ?*
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चुनावो की तारीख घोषित होने से लेकर प्रचार करने और मतदान होने तक की सारी प्रक्रियाएं लगभग एक माह के भीतर पूर्ण हो जाती है। मतदान के लिए सिर्फ एक दिन का वक्त होता है। आपको जो कुछ भी करना है इन कुछ दिनों में ही करना होता है। पार्टियो के पास संगठन होता है, सभी वार्डो, मुहल्लों, गाँवों, तहसीलों आदि में कार्यकर्ता होते है, और खर्च करने के लिए बेतहाशा रुपया होता है। इस तरह से इस तेज गति की दौड़ में बढ़त बना लेने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन होते है। उन्हें सिर्फ टिकेट लाना होता है। एक बार यदि टिकेट मिल जाए तो पार्टी के ये सभी संसाधन उसके हो जाते है। इस तरह से कोई नामालूम, निकम्मा, कमीना, भ्रष्ट और आपराधिक छवि का व्यक्ति भी अगर टिकेट ले आता है तो वह बिना कुछ किये ही चुनावी जीत का दावेदार हो जाता है।
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जबकि किसी स्वतंत्र उम्मीदवार के पास इतना बड़ा सांगठनिक ढांचा, कार्यकर्ता और चुनाव लड़ने के लिए पैसा नहीं होता। और इतने कम समय में वह कितनी भी मेहनत करके इन्हें जुटा भी नहीं पाता है। इस तरह से संसाधन विहीन स्वतंत्र उम्मीदवार के लिए बराबर के मुकाबले के अवसर समाप्त हो जाते है। गुटबंदी और पैसा देकर प्रत्याशी टिकेट ले आते है और मतदाताओ को बाध्य होकर इन्हें ही चुनना होता है।
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समस्या -- चुनाव प्रचार के लिए समय की कमी होने और मतदान के लिए सिर्फ एक दिन तय होने के कारण पूरी शक्ति प्रचार में झोंकनी होती है। सिर्फ इसी कारण से संसाधन युक्त पार्टी के उम्मीदवार अपनी बढ़त बना लेते है, और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार पिछड़ जाते है। यदि निर्दलीय उम्मीदवार पार्टी खड़ी करने पर काम करेंगे तो उन्हें दशको लग जाएंगे।
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समाधान :
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१) मतदान अवधि की सीमा बढ़ाना --- यदि मतदान को 365 दिनों और 5 वर्ष के लिए खोल दिया जाए तो स्थिति पलट जायेगी। इससे कम संसाधन होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार बिना किसी संगठन के भी धीमे धीमे अपना प्रचार करते रह सकते है। इससे उनके पास मतदाताओ तक पहुँचने के लिए पर्याप्त अवसर रहेगा। जब भी कोई मतदाता किसी उम्मीदवार से सहमत होता है, वह अपनी इच्छा से तब उसे वोट कर सकेगा। इस तरह से चुनाव पार्ट टाइम गतिविधि बन जायेगी और उम्मीदवारों को हड़बड़ी में अपने संसाधन नहीं झोंकने पड़ेंगे।
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२) जिस तरह बैंक अपना काउंटर लेकर रोज हमारे मोहल्ले में आकर नहीं कहता कि आज कि आज अपना पैसा निकालो या जमा कराओ, और फिर अगले 5 वर्ष तक किसी प्रकार का लेनदेन नहीं होगा, उसी तरह से मतदान में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी प्रक्रिया लागू करनी चाहिए जिससे जिस व्यक्ति के पास जब समय हो वो उस समय पटवारी कार्यालय या कलेक्ट्री में जाकर अपना वोटर कार्ड दिखाकर अपना वोट दे सके। इस व्यवस्था के आने से चुनाव आयोग को मतदान के लिए अपनी भारी भरकम मशीनरी नहीं लगानी होगी, तथा चुनावो का खर्च बच जाएगा।
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३) वोट वापिस लेने का अधिकार --- कई बार मतदाता धुँवाधार प्रचार की चपेट में आकर गलत उम्मीदवार चुन लेते है। लेकिन उनके पास अपना वोट बदल लेने का कोई मौका नहीं होता। किसी भी समय वोट करने के साथ ही मतदाता को अपना वोट बदलने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए। यदि किसी जनप्रतिनिधि के के मतों में एक निश्चित प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की जाए व किसी अन्य उम्मीदवार को एक वर्तमान प्रतिनिधि से अधिक मत मिल जाए तो अधिक मत वाला उम्मीदवार पद ग्रहण कर लेगा। इस व्यवस्था से मौजूदा प्रतिनिधियों पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव बना रहेगा।
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