हर दिन यहाँ तीर्थ बना है
हर उजाला ज्योति बनी है,
हर पंछी उड़ान लिए है
हर नदी तीर्थ चली है।
हर पहाड़ पर ऊँचाई है
हर खेत में अन्न उगा है,
हर जंगल में हवा शुद्ध है
हर झरने पर दृश्य अलग है।
हर मानव में देव अनेक हैं
हर विद्यालय में ज्ञान विविध है,
हर पुष्प का सौन्दर्य निराला
हर आग का ताप अलग है।
हर त्योहार के संदर्भ पवित्र हैं
हर पग का नाप अलग है,
हर आन्दोलन की नींव नयी है
हर जीवन का लय गूढ़ है।
*** महेश रौतेला