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नारी को पहले इतना समझा नहीं गया, उसे बस घर तक ही रखा गया। पर अब धीरे-धीरे समय बदल रहा है, और नारी भी आगे बढ़ रहा है। वो पढ़ना चाहती है, कुछ बनना चाहती है, अपने दम पर खुद को पहचानना चाहती है। अब वो सिर्फ घर तक सीमित नहीं है, उसके सपनों का भी कोई अंत नहीं है। हर काम में वो अपना हाथ बढ़ाती है, मुश्किलों से भी नहीं घबराती है। अगर उसे मौका और साथ मिले, तो वो हर मंजिल पा सकती है। कभी वो माँ बनकर सब संभालती है, कभी बेटी बनकर घर सजाती है, कभी बहन बनकर साथ निभाती है, हर रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाती है। आज वो स्कूल भी जाती है, अपने सपनों को सजाती है, कल वही आगे बढ़कर देश का नाम भी रोशन करती है। उसे बस थोड़ा सा भरोसा चाहिए, और आगे बढ़ने का मौका चाहिए, फिर देखना वो कैसे हर मुश्किल को आसान बना देती है। अब नारी चुप नहीं रहती, वो अपने हक के लिए बोलती है, गलत को गलत कहने की हिम्मत भी अब रखती है। नारी जब आगे बढ़ेगी, तभी तो देश भी आगे बढ़ेगा। उसकी मेहनत और हिम्मत से ही भारत सच में समृद्ध बनेगा। नारी है तो हर सपना साकार है, उसी से हर घर-आंगन में प्यार है, उसका सम्मान ही सबसे बड़ा धन है, इसी से मजबूत अपना हिंदुस्तान है।
“मैं अभी भी खड़ी हूँ” मैं हारकर भी हर बार, खुद को समझा लेती हूँ, दिल टूटता है रोज़ थोड़ा, फिर भी मुस्कुरा देती हूँ। कभी ख्वाब थे BHU के, कभी DU की राहें थीं, अब नंबरों के जंगल में, बस उम्मीदें ही बाहें थीं। वो जो कहते थे “छोड़ दो”, मैं खुद को ही पकड़ लेती हूँ, ना जाने क्यों हर बार, मैं ही पहले call कर देती हूँ। कमज़ोर नहीं हूँ मैं, बस दिल थोड़ा सच्चा है, जो चला गया, वो मेरा नहीं, ये समझना अभी कच्चा है। डर भी है, confusion भी, और आँखों में सवाल बहुत, पर अंदर कहीं एक आवाज़ है— “तू कर सकती है, बस रुक मत।” अगर ना मिला वो जो चाहा, तो इसका मतलब खत्म नहीं, रास्ते बदल सकते हैं, पर मंज़िल का कोई अंत नहीं। मैं टूटी हूँ, ये सच है, पर खत्म नहीं कहानी, मैं फिर से उठूँगी एक दिन— और यही होगी मेरी असली जीत की निशानी।
“रिश्ता खत्म करने की हिम्मत तो कर ली मैंने, पर खुद से लड़ना अभी बाकी है। हर बार ठान लेती हूँ कि अब नहीं करूंगी call, फिर जाने क्यों उंगलियाँ वही नंबर मिलाती हैं। शायद उसे नहीं… उस आदत को छोड़ना मुश्किल है, जो हर रोज़ मेरी जिंदगी का हिस्सा थी। पर इस बार खुद से वादा किया है, चाहे दिल कितना भी माने… मैं नहीं मानूँगी।”
143 कोई अंत नहीं, एक शुरुआत की बात है, ये वो मोड़ है जहाँ मेहनत फिर से साथ है। थोड़ा सा कम लग सकता है ये आंकड़ा, पर सपनों से बड़ा कभी कोई ना हिसाब है। डीयू की गलियों में उम्मीदें चलती हैं, हर कोशिश के पीछे नई रौशनी पलती है। कभी कटऑफ ऊपर, कभी नीचे झुकता है, पर मेहनत करने वाला कभी नहीं रुकता है। जो आज रह गया थोड़ा सा पीछे कहीं, वो कल सबसे आगे भी हो सकता वहीं। बस खुद पर भरोसा बनाए रखना तुम, क्योंकि कोशिशों की हार नहीं होती कभी।
सच्चा मित्र तुम नमक नहीं, चंदन हो, मेरे जीवन का मधुर स्पंदन हो। जब-जब मन में पीड़ा आती है, तुम्हारी बातों से ठंडक छा जाती है। दुनिया अक्सर घाव बढ़ा देती है, दर्द पर नमक छिड़क जाती है। पर तुम चंदन बनकर आते हो, हर पीड़ा को शीतल कर जाते हो। जब राहें धुंधली हो जाती हैं, और उम्मीदें भी सो जाती हैं, तब तुम दीपक बनकर जलते हो, अंधेरों में रास्ता दिखाते हो। सच्चा मित्र वही कहलाता है, जो हर दुख में साथ निभाता है। जो गिरने पर हाथ बढ़ाता है, और हिम्मत भी दे जाता है। तुम नमक नहीं, चंदन हो, जीवन का सुंदर बंधन हो। घावों को भरने के साथ-साथ, मन को शीतल करने का कारण हो। 🌸
हर सुबह की तरह सूरज वही था,हवा भी वही थी, आसमान भी वही था,पर पंछी आज कुछ उदास थे,क्योंकि एक बेटी का सपना आज टूटने वाला था। पापा की इज्जत रखने कोउसने हाथों में मेहंदी सजा ली,जिस बाप ने उम्र भर जोड़ा खजाना,वो भी बेटी के ब्याह में लुटा दी। सोचा था खुशियों का घर मिलेगा,कोई हमसफर साथ निभाएगा,पर किस्मत ने ऐसा मोड़ दियाजहाँ हर दिन दर्द ही आएगा। पहला थप्पड़ पड़ा तो चुप रह गई,सोचा गुस्से में होगा, मान लिया,धीरे-धीरे वो जुल्म बढ़ता गयाऔर उसने सब कुछ सहना जान लिया। दुल्हन बनने का शौक था उसका,पर पल भर में सब बिखर गया,जिसे हमसफर कहने चली थी,वही उसका सबसे बड़ा दर्द बन गया। यकीन मानो, हर चुना हुआ रिश्ताहमेशा खुशियाँ नहीं लाता,कभी-कभी माँ-बाप का भरोसा भीबेटी की खामोशी में दर्द बन जाता।
बारिश और यादें पहली बारिश अक्सर बीमार कर देती है, दूसरी में वो पहली सी महक नहीं रहती। कुछ एहसास भी मौसम जैसे बदल जाते हैं, दिल वही रहता है, मगर धड़कन वही नहीं रहती।
प्रथम प्रेम ही सच्चा और गहरा होता है, क्योंकि उसमें कोई छल-कपट नहीं होता है। अनजाने में ही दिल किसी का हो जाता है, और वही एहसास उम्र भर साथ रह जाता है। पहली बार जो धड़कनों में नाम उतरता है, वो याद बनकर हमेशा दिल में ठहरता है। समय भले ही आगे बढ़ जाए बहुत दूर, पर पहला प्रेम दिल से कभी नहीं उतरता है। ✨
गंगा की हवा, वो गलियाँ काशी की, यादों में अब भी महकती रहेंगी। छोड़ तो रहा हूँ आज तेरी चौखट, पर मेरी पहचान यहीं से रहेगी। मेरे हर ख़्वाब में एक नाम रहेगा— Banaras Hindu University, तू सिर्फ़ विश्वविद्यालय नहीं, मेरी ज़िंदगी का एक ख़ूबसूरत मुकाम रहेगा।
अधूरी मोहब्बत राहुल का जीवन हमेशा शांत और अलग था। स्कूल के गलियारों में लोग उसे देखते, लेकिन कोई उसके दिल की गहराई तक नहीं पहुँच पाता। वह बातों में कम और नजरों में गहरी होती थी। उसके दोस्तों की संख्या कम थी, पर वह जिसे जानता था, उसे समझता था—गहरी समझ, बिना कहे। लोग कहते—“उसका दिल सख्त है, कोई पास नहीं आने देता।” आकांक्षा पहली बार उसे बारिश के दिन मिली। लाइब्रेरी की खिड़की पर बूंदें गिर रही थीं, और राहुल अपनी किताब में खोया हुआ था। उसकी आँखों में हल्की उदासी थी, जो किसी से साझा नहीं की गई थी। आकांक्षा ने महसूस किया कि उसके भीतर भी कुछ नर्म बचा है, जो किसी को दिखाई नहीं देता। शुरुआत में, आकांक्षा सिर्फ उसे दूर से देखती। कभी लाइब्रेरी में, कभी बाग़ में। राहुल हमेशा अकेला रहता, पर आकांक्षा की नजरें धीरे-धीरे उसे महसूस करने लगीं। एक दिन बारिश के बाद, बाग़ की चट्टानों पर हरी घास चमक रही थी। आकांक्षा ने कहा, “तुम कहते हो दिल सख्त हो गया है, पर मैंने देखा है—बरसात के बाद चट्टानों पर भी हरी ज़िद उग आती है।” राहुल ने पहली बार उसकी बातों में रुचि दिखाई। उसने पूछा, “तुम हमेशा इतनी गंभीर बातें क्यों करती हो?” “क्योंकि मैं देख सकती हूँ कि जो तुम कहते हो, उससे कहीं ज़्यादा कुछ है जो तुम छुपाते हो।” समय के साथ, आकांक्षा ने राहुल की दुनिया में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। कभी उसकी पसंदीदा चाय लेकर, कभी उसकी किताबों पर हल्की हँसी छोड़कर। राहुल ने महसूस किया कि उसकी चुप्पियाँ अब अकेली नहीं थीं। एक शाम, बगीचे की छाया में, आकांक्षा ने कहा— “अगर इजाज़त हो, तो मैं तुम्हारे दिल में पूरी नहीं, बस अधूरी-सी मोहब्बत बनकर ठहर जाऊँ।” राहुल ने उसकी आँखों में देखा। कोई दबाव नहीं, कोई मांग नहीं। बस शांति और अपनापन। पहली बार उसने महसूस किया कि किसी के लिए उसका सख्त दिल भी मुलायम हो सकता है। उनकी मोहब्बत अधूरी थी। कोई वादा नहीं, कोई पूरा होने का दबाव नहीं। सिर्फ थोड़ी-सी नर्मी, थोड़ी-सी उम्मीद, और अधूरी मोहब्बत का सौंदर्य। आकांक्षा और राहुल की दिनचर्या में छोटी-छोटी बातें शामिल हो गईं। बारिश में भीगकर किताबें पढ़ना, चाय के कप के पास बैठकर खामोशी में बातें करना, और बस एक-दूसरे की उपस्थिति महसूस करना। कभी-कभी वे झगड़ते भी—राहुल की चुप्पियों और आकांक्षा की उत्सुकता के कारण। पर हर झगड़े के बाद उनकी नज़दीकियाँ और बढ़ती। समय बीतता गया। राहुल ने समझा कि आकांक्षा की मौजूदगी ने उसकी जिंदगी को बदल दिया है। वह अब अकेला नहीं था। उसकी चुप्पियाँ अब खाली नहीं थीं। और आकांक्षा ने समझा कि कभी-कभी मोहब्बत को पूरा करने की ज़रूरत नहीं होती—बस महसूस करने की होती है। उनकी अधूरी मोहब्बत, उनकी छोटी-छोटी आदतें, उनकी खामोशियाँ, और उनके साझा पल—सबकुछ उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गए। कभी-कभी, वे बस बगीचे में बैठते और बारिश के बाद की नमी को महसूस करते। राहुल कहता, “तुम्हारी नमी मेरे भीतर पहुँच जाती है।” और आकांक्षा मुस्कुराकर जवाब देती, “बस यहीं, अधूरी मोहब्बत बनकर, ठहर जाओ।” कभी-कभी अधूरा होना ही सबसे पूरा महसूस होता है। और उनके लिए, यही अधूरी मोहब्बत—सदा के लिए, पर हमेशा अधूरी—सबसे खूबसूरत एहसास बन गई
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