Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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दोहे
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भगवान चित्रगुप्त जी
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चित्रगुप्त भगवान की, महिमा बड़ी अपार।
अधर्म -धर्म का रखें, लेखा वो तैयार।।

कागज कलम दवात संग, ब्रह्मा का वरदान।
चित्रगुप्त के न्याय का,अद्भुत नियम विधान।।

हाथ जोड़ विनती करूँ, चित्रगुप्त भगवान।
क्षमा भूल करके मेरा, कर दो अब कल्याण।।
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विविध
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मर्यादा में हम सभी, करें प्रेम व्यवहार।
विनय करें यमराज जी, माँ दुर्गा के द्वार।!

कहते हैं यमराज जी, करो मातु का ध्यान।
सीख ज्ञान का दे रहीं, उसको भी लो जान।।

अभी-अभी यमराज जी, पहुँचे माँ दरबार।
शीश झुका कहने लगे, करिए मम उद्धार।।

बात हमारी तुम सुनो, मम प्रियवर यमराज।
आओ मिलकर हम करें, इस दुनिया पर राज।।

पुरखों ने जिसके किया, सबका बंटाधार।
वही रंग दिखला रहे, घूम-घूम हर बार।।

बुद्धिहीन कुछ लोग हैं, बने हुए अभिशाप।
खुद को ईश्वर मानते, भरे कर्म में पाप।।

कारण चक्का जाम का, आज बनी है मात।
इसके पीछे लोग जो, चाह रहे हैं लात।।

जिसे नहीं कुछ ज्ञान है,भौंक रहे वो लोग।
कुर्सी कुंठा राग है, या फिर नया प्रयोग।।

सत्ता जिनसे दूर है, वे सब हैं बेचैन।
भोली जनता को ठगें, कपट भरे ये नैन।।

बड़े बुजुर्गों का सदा, आप करो सम्मान।
जान बूझकर क्यों भला, बनते हो नादान।।

बच्चे नादानी करें, तो सबको स्वीकार।
बड़े करें तो शर्म है, उचित नहीं व्यवहार।।

मनमानी करना नहीं, इसका रखिए ध्यान।
समय आज का कह रहा, यही उचित है ज्ञान ।।

मत करिए अभिमान सब, देता कष्ट अपार।
नहीं किसी का है हुआ, इससे बेड़ा पार।।

मन मलीन क्यों कर रहा, समय बड़ा बलवान।
थोड़ा सा तो धैर्य रख, मत बन तू नादान।।

दुविधा में हैं हम सभी, कुंठित मन के भाव।
दिखलाते फिर क्यों भला, खुशहाली के चाव।।

जननी वो मेरी लगे, यह कैसा मम भाव।
उसके आँचल में लगे, शीतल सारे घाव।।

जीवन में अनुराग का, किसे रहा अब मोह।
मानव का सबसे बड़ा, बनता यही बिछोह।।

समय चाहता आपसे, मान और सम्मान।
तभी आपका हर समय, रख पाएगा ध्यान।।

बड़बोले पन में गया, जो था उसके हाथ।
बिखर रहा परिवार भी, कौन रहे अब साथ।।

धोखा भी तो काम है, करते रहिए मित्र।
चाहे जैसा आपका, होवै चाल चरित्र।।

ज्ञानी हम कितने बड़े, नहीं जानते यार।
बात अलग यह और है, खाते रहते मार।।

मेरे लिए तो आप ही, ज्येष्ठ श्रेष्ठ विद्वान।
मूरख हमको जानकर, नित रखिएगा ध्यान।।

झुककर जो रहता सदा, पाता है नित मान। सभी श्रेष्ठ उनको कहें, जिसको जितना ज्ञान।।

व्यर्थ समय क्यों कर रहे, करके अच्छे काम।
बूझ समझकर क्यों भला, होते हो बदनाम।।

कंठी माला पहनकर, ढ़ोगी लगते आप।
राह उचित अब चल जरा, क्यों करते नित पाप।।

चिंतन मनन विचार का,सुखद मिले परिणाम।
राह उचित अब चल जरा, श्रेष्ठ दिखे हर काम।।

सकल जगत परिवार है, जिनको इसका ज्ञान।
निंदा नफरत क्यों करें, श्रेष्ठ गुणी विद्वान।।

वेदी उनकी पुष्प से, सजे हजारों साल।
हर शहीद की याद में, जलती रहे मशाल॥
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दीवाली
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दीप पर्व देता हमें, नव जीवन उत्कर्ष।
फैलाएं मिल हम सभी, चहुँदिश में नव हर्ष।।

हर कोने से दूर हो, अंधकार का राज।
तभी सफल हो पर्व में, दीप जलाना आज।।

दीवाली पर प्रेम का, भेजें शुभ संदेश।
कहता है यमराज भी, त्यागो मन के क्लेश।।

एक दीप ऐसा जले, मिटे तमस चहुँओर।
अरुणिम धवल उजास से, भर जाये हर भोर।।

जब भी दीप जलाइए, रखिए इतना ध्यान।
रामचंद्र जी से जुड़ा, हम भक्तों का मान।।

समरसता का दे रहा, दीवाली संदेश।
अपने भारत का रहे, सदा यही परिवेश।।

जो निर्बल असहाय हैं, उनको रखिए साथ।
आये जब मुश्किल घड़ी, थामें उनका हाथ।।

दीवाली त्योहार का, रखना हमको ध्यान।
राम प्रभो का है जुड़ा, सबसे पहले मान।।
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करवा चौथ
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पति परमेश्वर बन गया, सारा पुरुष समाज।
करवा माई कर कृपा, एक दिवस का राज।।

पति पत्नी के मध्य में, होता कैसे खेल।
एक दिवस पतिदेव का, बाकी दिन तो रेल।।

व्रत रखती हैं पत्नियां, कटती पति की जेब।
फिर भी पत्नी कह रही, इनमें सारे ऐब।।
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सुधीर श्रीवास्तव

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112007104
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