१९…“वाराणसी”
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नदी के कगार पर
समय आज भी अपनी राख झाड़कर उठता है —
जैसे कोई प्राचीन श्वास
नये शरीर में प्रवेश कर गया हो।
भीड़ में एक आदमी है —
कपड़ों में शहर की चमक,
पर आँखों में सदियों का अँधेरा और प्रकाश
साथ-साथ धड़कता हुआ।
वह नंदी पर बैठा है —
लेकिन यह नंदी अब पत्थर नहीं,
स्टील और इंजन की गंध में पड़ा
एक आधुनिक प्रतीक है,
जिसके पहियों में
कुचले हुए सपनों की जगह
बिजली की नीली लकीरें दौड़ती हैं।
उसके हाथ में त्रिशूल है —
कोई हथियार नहीं,
बल्कि एक विद्युत-धड़कन
जो भीतर के अव्यवस्था को चीरते हुए
ज़िंदगी के मूल तक पहुँचने की ज़िद करती है।
वह आवेश में आगे बढ़ता है —
पर लड़ने किसी से नहीं,
अपने भीतर की टूटनों से,
अपनी ही राख से जन्मे
छाया-पशुओं से।
गंगा के ऊपर फैली धुंध
उससे पूछती है —
“कहाँ जा रहे हो?”
और वह उत्तर देता नहीं…
क्योंकि वाराणसी में उत्तर नहीं दिए जाते,
यहाँ उत्तर जिए जाते हैं।
घंटों की आवाज़
काँच की इमारतों में गूंजती है,
जैसे समय खुद भूल गया हो
कि वह कितना पुराना है।
यह शहर
आधुनिक आदमी को भी
अंदर से प्राचीन बना देता है —
एक ऐसा प्राचीन
जिसकी नसों में
वर्तमान की बिजली बहती है
और भविष्य की राख।
वह नंदी पर आगे बढ़ता है,
उसका त्रिशूल
भीड़ को नहीं,
सड़क पर बिखरी
अपनी ही अनिश्चितताओं को चीरता है —
ज़िंदगी की उस जिद को
जो मरना नहीं चाहती,
और उस डर को
जो जन्म लेना नहीं चाहता।
वाराणसी उसके पीछे-पीछे चलती है —
घाटों की तरह,
धूप से पके देवदार की तरह,
एक अनंत प्रतिध्वनि की तरह।
क्योंकि यहाँ
हर आदमी आधुनिक होकर भी
किसी न किसी जन्म का
पुरातन यात्री होता है।
और हर यात्री
कभी न कभी
नंदी पर बैठकर
अपना त्रिशूल उठाता ही है —
अंधेरे को चीरने के लिए,
या खुद को देखने के लिए।
यही वाराणसी है —
जहाँ आदमी बदलता नहीं,
बस स्वयं को पहचानने लगता है।
नंदी पर बैठा वह आधुनिक आदमी
जब मणिकर्णिका घाट के पास पहुँचता है,
तो शहर अचानक
एक अजन्मे शांत देवता की तरह
अपनी साँस रोक लेता है।
यहाँ
धुआँ सिर्फ लकड़ियों का नहीं,
सदियों के अधूरे सवालों का भी उठता है —
जो हवा में मिलकर
हर आग को एक ही भाषा में बदल देते हैं:
सत्य।
मणिकर्णिका,
जहाँ जीवन की भीड़
मौत की लय में बदल जाती है,
जहाँ समय अपना शरीर उतारकर
राख की चादर ओढ़ लेता है।
वह आदमी —
आधुनिक, तेज़, तकनीक में डूबा —
इस घाट पर आते ही
अपने भीतर की अमरता को
पहली बार मरते हुए महसूस करता है।
त्रिशूल उसकी मुट्ठी में
अब सिर्फ आवेश नहीं,
बल्कि वह काँपता हुआ सत्य है
जो कहता है —
“सब कुछ अस्थायी है,
पर जो भीतर जलता है
वही अंतिम है।”
नंदी के पहिए
राख पर से गुजरकर
एक धीर, गंभीर आवाज़ पैदा करते हैं —
जैसे शहर स्वयं कह रहा हो,
“यहाँ से गुजरने वाले
खुद को पीछे छोड़ जाते हैं।”
मणिकर्णिका की आग
उसकी आँखों में उतरती है —
कोई भय नहीं,
बस एक ऐसा स्वीकार,
जो इंसान को मनुष्य से
अनुभव बना देता है।
यह घाट
हर आधुनिकता को पिघलाकर
एक शुद्ध, निर्वस्त्र सच्चाई में बदल देता है:
कि अंत ही वह दरवाज़ा है
जिससे होकर जीवन
एक नए अर्थ में प्रवेश करता है।
वह आदमी
नंदी पर बैठा, त्रिशूल थामे
आगे बढ़ता रहता है —
लेकिन अब आवेश नहीं,
एक शांत-जलती हुई दृढ़ता के साथ।
क्योंकि मणिकर्णिका घाट ने उसे सिखा दिया है —
कि जो बुझता है
वह मिटता नहीं,
और जो जलता है
वह बदल जाता है।
यही वाराणसी है,
और यही मणिकर्णिका —
जहाँ आदमी अपनी मृत्यु देखकर
पहली बार
अपना जीवन समझ पाता है।
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