१८…"बुरे अनुभव"
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बुरे अनुभव जैसा कुछ नहीं होता,
वह भी हमारी रूह का अँधेरा है,
जहाँ दर्द खुद को आग की तरह जलाता है,
फिर भी उस राख में छुपा होता है नया सूरज।
हर ठोकर, हर आँसू, हर टूटती साँस,
जैसे पत्थर में उकेरी जाती एक रेखा,
जो समय के बहाव में हीरे की तरह चमक उठती है।
हमारे अंदर की कमजोरियों की चोटें,
दरअसल हमारी ताकत की नींव हैं।
वह क्षण जब दुनिया ने हमें गिराया,
वह क्षण जब उम्मीदें धूल में मिल गईं,
वह क्षण जब कोई हाथ हमारे हाथ नहीं थामा—
वहीं हम स्वयं को पहचानते हैं,
अपनी असली मिट्टी में, अपने असली अस्तित्व में।
बुरे अनुभव सिर्फ अंधेरा नहीं हैं,
वे हमारी आत्मा की किताब के पन्ने हैं,
जिन्हें पढ़कर हम अपने भविष्य को लिखते हैं।
और हर घाव, हर दर्द, हर अकेलापन,
सिर्फ एक सिख है—
कि हम हैं, और हम बनते जा रहे हैं,
असंभव को भी संभव में बदलते हुए।
बुरे अनुभव जैसा कुछ नहीं होता,
वह भी हमारी रगों में दौड़ता खून है,
सटीक, कठोर, कभी-कभी बेधड़क।
हर ठोकर, हर विफलता, हर टूटता पल,
जैसे हमारी आत्मा पर शटर क्लिक करता है,
काला और उजाला, दर्द और हँसी,
सब एक ही फ्रेम में कैद।
हम गिरते हैं—और गिरते ही उठते हैं,
जैसे ब्रेक हुए तारों से बिजली निकलती है।
वह अकेलापन, वह ठंड, वह घबराहट,
हमें हमारी असली पहचान दिखाता है—
कोई स्क्रीन, कोई फिल्टर, कोई दिखावा नहीं।
बुरे अनुभव सिर्फ अंधेरा नहीं हैं,
वे हमारी रफ़्तार हैं, हमारी आवाज़ हैं,
वे हमारे अंदर की बाग़ी को जगाते हैं।
और जब दुनिया कहती है “तू नहीं कर पाएगा,”
हम अपने घावों को हथियार बना लेते हैं,
क्योंकि अब हम जानते हैं—
धड़कते हुए दर्द से भी बड़ी चीज़ कोई नहीं।
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