१४…“बिस्तर के आवेग में"
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आवेग से भरे लोग,
रात के बिस्तर-जंगलों में
उगा लेते हैं अपने भीतर
अनकहे वृक्ष —
क्या तुम अँधेरे में भी
उन्हें देख पाते हो?
रजाई के सियाह हिस्सों में
छिपे होते हैं जुगनू,
पर आवेग में
कोई उनकी रौशनी नहीं देखता।
नींद से आगे निकल जाता है बिस्तर,
जब आवेश
शरीर का शोषण कर
अपना ज़हर उगलता है —
और लोग,
उसे मुस्कान में घोलकर पी जाते हैं।
उन्हें परवाह नहीं,
वे बस लापता होना चाहते हैं
रात की गहराइयों में,
जहाँ दुबककर बैठना
उनकी आख़िरी ख्वाहिश बन जाती है।
बिस्तर — ओ बिस्तर,
तू देखता है सब कुछ।
तू जानता है उन्हें,
जो तुझे छूकर भी
कभी महसूस नहीं कर पाते।
वे चुप है, पर उनकी खामोशी
किसी स्वीकारोक्ति से कम नहीं।
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