१०…"जहाँ मिलना न हो मुश्किल"
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जहाँ मिलना न हो मुश्किल,
आसमान ठहर जाए,
धरती बहने लगे अपनी ही रहगुज़र में,
और समुद्र खो दे अपनी नदी को,
खुद को तराशकर,
एक नया शिल्प रख दे वक्त की हथेली पर।
जहाँ मिलना न हो मुश्किल,
झीलें खर्चा हो जाएँ अपनी मासूम साँसों की,
पानी से होकर,
तुम तक पहुँच जाए हमारी तलाश की परछाईं।
खो जाना मत इन रास्तों पर,
हर बेजुबान जानवर
तुम्हें घर तक नहीं पहुँचा पाएगा।
जहाँ मिलना हो मुश्किल,
नीला आसमान बस किसी राह से गुजरे,
उसके टायर पकड़ ले ये बहती हुई धरती,
और फिर समुद्र, अपनी घिसी हुई रूह से,
नया रूप ढाले।
समुद्र की ओ नदी,
नदी ओ समुद्र की—
एक दूसरे में विलीन,
लेकिन कभी पूरी तरह नहीं।
अब तकिए तले मत दो,नमी उन मासूम झीलों की,
उनकी मासूमियत खर्च नहीं होती,
और ईश्क की जुबान—
कौन ले, किसे बेचे, वार-वार?
हवा के खत,
पानी पर बहते हुए,
हम तक पहुँचेंगे।
जहाँ मिलना हो मुश्किल,
ऐसी राहों में,
तुम फिर न मिलना,
और कह देना उनसे—
ओ नदी,
ओ नदी,
हम फना हुए समुद्र,
अब क्या पानी में
खाक डूबेंगे दुबारा?
दुबारा…
दुबारा…
दुबारा…
किसने देखा है उस जहाँ को,
जहाँ मिलना हो मुश्किल,
उस आशियाने को?
समुद्र समुद्र थे,
समुद्र रहेंगे,
खारापन दुनिया ने दिया,
हम अपने आंसुओं में
खारापन कहेंगे।
जहाँ मिलना न हो मुश्किल,
ऐसी राहों में,
मिलों न दुबारा।
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