Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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५..."जहाँ मृत्यु साँस लेती है"
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हुआ है क्या से क्या —
एक पत्ता टूटा,
और ब्रह्मांड की नब्ज़ बदल गई।
किसी ने नहीं सुना वह आवाज़,
जो जड़ों के भीतर गूँज रही थी —
जैसे कोई बूढ़ा वृक्ष अपने भीतर
अपना शोक पढ़ रहा हो।

हल्की सी घटा छूकर गुज़री थी,
पर उसकी नमी अब तक
मेरी आँखों के पीछे जलती है।
किसी की मृत्यु शायद
मेरा जन्म होती है —
और मैं हर बार
एक नए शून्य में उतरता हूँ।

पत्तों की मृत्यु कैसी होती है?
कोई नहीं जानता।
बस इतना कि हवा उन्हें अपने साथ
बिना अंतिम संस्कार के ले जाती है,
और लोग कहते हैं — पतझड़ आ गया।
पर मैं देखता हूँ —
धरती के भीतर कुछ जागता है,
किसी की नब्ज़ अब भी चल रही है
उस राख में।

फूलों की दुकानों पर
लगी है मृत सुगंधों की भीड़,
और मैं —
उनके बीच एक जीवित शव,
जो जानता है कि
हर गंध के भीतर एक मरती हुई स्मृति है।

दरवाजों पर टँगे वे माला-जैसे शव
अब भी मुस्कराते हैं,
मानो पूछते हों —
किसने कहा कि मृत्यु अंत है?

मैं जब किसी लाल या पीले पत्ते को गिरते देखता हूँ,
तो मुझे अपने भीतर की साँस सुनाई देती है —
वह जो अब तक छिपी थी
किसी मौन की परत के नीचे।

कभी-कभी रात पुकारती है मुझे,
किसी टूटे वृक्ष की तरह,
किसी गहरे सन्नाटे की तरह।
और मैं उठता हूँ —
सिद्धार्थ की तरह नहीं,
बल्कि उस पेड़ की तरह
जो अपनी जड़ें छोड़कर भी
धरती में रह जाता है।

मैं निकल पड़ता हूँ,
हर बार —
और लौटता नहीं।
क्योंकि अब मुझे पता है,
घर वही है, जहाँ मृत्यु साँस लेती है।

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Hindi Poem by Anup Gajare : 112003194
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