३...“शब्द जो ज़हर से बने”
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कभी सोचा है —
गालियाँ कैसे जन्म लेती हैं?
कोई माँ अपने बच्चे के होंठों पर
ज़हर तो नहीं रखती,
फिर भी हम बोलते हैं —
जैसे हर शब्द किसी अधूरी पुकार से निकला हो।
हम जब रो नहीं पाते,
तो चिल्लाते हैं,
जब जीत नहीं पाते,
तो काटते हैं शब्दों से —
अपने ही समान किसी को।
गाली...
एक टूटी हुई प्रार्थना है,
जिसे किसी ने अधूरे प्रेम में गढ़ा था।
वह दर्द है —
जो शब्दों में अपना नाम नहीं ढूँढ पाया।
कभी किसी की गाली सुनो —
उसमें उसकी भूख बोलती है,
उसका अपमान, उसका बचपन,
उसके भीतर कुचला गया कोई सपना।
ये शब्द पाप नहीं,
बस वे पथराए हुए आँसू हैं,
जो आँखों से नहीं निकले।
और हम —
उन्हें समझने के बजाय
उनसे घृणा करते हैं,
जैसे अँधेरा देखकर
दीये को दोष दें।
कभी कोई गाली
सिर्फ गाली नहीं होती,
वह उस समय की गवाही होती है
जब इंसान अपनी भाषा खो बैठा था।
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