"वरक़-ए-माज़ी"
वरक़-ए-माज़ी खोलकर क्या मिलेगा,
अब दिल मेरा टटोलकर क्या मिलेगा।
हिज्र की शब में तसव्वुर के चराग़,
इन ख़यालों को फूँककर क्या मिलेगा।
सुख़न में तल्ख़ी, निगाहों में शुबा,
ज़हर-ए-लब को बोलकर क्या मिलेगा।
नश्तर-ए-याद से कुरेदा है जिगर,
ज़ख़्म-ए-सीना कुरेदकर क्या मिलेगा।
तअल्लुक़ात की ज़ंजीरें हैं मुरझाई,
इन गिरहों को खोलकर क्या मिलेगा।
ख़्वाब सब राख़ में तब्दील हुए,
उन निशानों को जोड़कर क्या मिलेगा।
ग़ुबार-ए-राह में दबी सुक़ूत-ए-हयात,
इस ख़मोशी को तोड़कर क्या मिलेगा।
"कीर्ति" तजुर्बा-ए-दिल कह रहा है यही,
ग़म की सौग़ात ढोकर क्या मिलेगा।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️
वरक़-ए-माज़ी = अतीत के पन्ने
हिज्र = जुदाई, बिछड़ना
तसव्वुर = कल्पना, ख़याल
सुख़न = बात, अल्फ़ाज़
तल्ख़ी = कड़वाहट
शुबा = शक, संदेह
ज़हर-ए-लब = ज़हरीली बातें (लब = होंठ)
नश्तर = चाकू/तीर की नोक, चुभन
तअल्लुक़ात = रिश्ते, संबंध
गिरह = गाँठ
ग़ुबार-ए-राह = सफ़र की धूल
सुक़ूत-ए-हयात = ज़िंदगी की ख़ामोशी
सौग़ात = तोहफ़ा, उपहार