इंजन का महादर्शन और कोलंबिया की चुस्की!
________________________________
कोलंबिया की धरती पर अभी–अभी बाबाजी ने अपने ज्ञान–यज्ञ की अग्नि जलाई। सामने बैठे थे इंजीनियरिंग के भोले–भाले विद्यार्थी, जिनके माथे पर अभी–अभी गणित के पसीने की बूंदें सूखी भी न थीं। तभी बाबाजी ने माइक पकड़ा और प्रश्न दाग दिया—
"डेढ़ सौ किलो की मोटरसाइकिल दो को ढो लेती है, और तीन हज़ार किलो की कार एक अकेले को ढोती है। अजी, ये कैसा न्याय है?"
छात्रों की आँखें फैल गईं, जैसे किसी ने भौतिकी की किताब में अचानक से रामचरितमानस के दोहे डाल दिए हों। एक बहादुर छात्र खड़ा हुआ और कांपते स्वर में बोला—“सर, इलेक्ट्रिक कारें पेट्रोल कारों से हल्की होती हैं…”
बस यहीं से बाबाजी ने अपनी ब्रह्मास्त्र–थ्योरी छोड़ दी—
"बेटा, असली दोष इंजन का है। टक्कर में बाइक का इंजन छिटक जाता है, कार का इंजन घुस जाता है और मार डालता है।"
सभागार में सन्नाटा। फिर हल्की खुसर–पुसर। और फिर ऐसा ठहाका गूंजा कि अगर कोलंबिया की एंडीज़ पहाड़ियाँ न होतीं, तो हंसी सीधे अटलांटिक तक लुढ़क जाती।
अब जनता सोच रही है—कार का इंजन मारे या बचाए, लेकिन बाबा की “इंजन उपनिषद” सुनकर लोग हँसते–हँसते प्राण ज़रूर त्याग देंगे। और उनके चेले–चपाटे चैनलों पर बैठकर ऐसे गूढ़ विश्लेषण करेंगे मानो सामने छठे दर्जे के मेकैनिक का अनाथ बच्चा हो, और वही तय करेगा कि पिस्टन कैसे नाचेगा।
वैसे इंजन की याद आई तो याद आया कि आपके दिवंगत चाचा जी ने भी कभी दिल्ली के अर्जुन दास से मारुति का इंजन बनवाया था। तब उस मारुति को लोग “टिन का डिब्बा” कहते थे। पर देखिए—वो डिब्बा आज भी सड़कों पर फटाफट भाग रहा है। जबकि बाबाजी के तर्क का डिब्बा तो लॉन्च होते ही पंचर निकला।
और हाँ, कोलंबिया साधारण देश नहीं है। वहाँ का सुल्फ़ा पूरी दुनिया में टॉप रैंक पर है। दो कश लगाओ और वही दर्शन होने लगे जो बाबाजी मंच से फूँक रहे हैं। फिर कोलंबियन कन्याएँ—हाय राम!—ऐसी आँखें डालें कि इंजन–पिस्टन भूल जाएँ, आदमी सीधे स्टीयरिंग पकड़ ले।
इसलिए, हे बाबा! इंजन का बोझ अपने कंधों पर मत उठाइए। इंजन का काम मैकेनिक को करने दीजिए। आपका काम है—गोष्ठी, गप्पें और गपशप। वही कीजिए, उसी में आपका आध्यात्म है, और उसी में आपकी गद्दी का संरक्षण।
जब तक बाबा ऐसी ही “इंजन–गाथाएँ” सुनाते रहेंगे, तब तक देश की सत्ता भी टस से मस नहीं होगी।
लिखकर रख लीजिए—मोदी जी की कुर्सी हिलेगी नहीं, पर जनता हँसते–हँसते गिर ज़रूर पड़ेगी।