हिंदु धर्म और पंडित पुजारी परम्परा।
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जिस घड़ी हिंदुओं का पंडित पुजारी-तंत्र टूटेगा, उसी क्षण से उनके धर्म के अवसान का शंखनाद सुनाई देगा। आलोचनाओं और आक्रमणों के तूफ़ान के बावजूद हिंदुओं के लिए इस परंपरा को बचाए रखना अनिवार्य है।
आजकल हिंदू समाज के कुछ अग्रणी संगठन सुधार के मोह में मूल परंपराओं की जड़ काटने की भूल कर रहे हैं।
मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं में वास्तविक शक्ति तो पंडित और पुजारियों के हाथों में ही होने चाहिए। धर्म की मूल संरचना की रक्षा करना उनका ही दायित्व है।
हर धर्म की एक आत्मा होती है, एक अविचल स्वरूप। यदि वह खो गया तो धर्म केवल नाम भर का रह जाएगा। हिंदू धर्म की उस आत्मा का केंद्र है, पंडित और पुजारी व्यवस्था। यही नींव है, यही स्तंभ है।
भूलकर भी इस स्तंभ को गिराइए मत। क्योंकि जब तक पंडित और पुजारी जीवित रहेंगे, आपका धर्म जीवित रहेगा। वे आपके धर्म के प्रहरी हैं।
जिस धर्म के पास पुजारी न हों, वह दीर्घायु नहीं होता।
प्रत्येक धर्म की अपनी विशिष्ट व्यवस्था है, इस्लाम की रक्षा उसकी सैनिकों जैसी अनुशासन करती है, ईसाई धर्म का आधार सत्ता और संगठन है, बौद्ध धर्म ने ज्ञान को ही पुरोहित बनाया, और हिंदू धर्म की जीवन-रेखा है, पंडित पुजारी-परंपरा।
डॉ. आंबेडकर ने स्वीकार किया है कि पंडित पुजारी परंपरा हिंदू धर्म के लिए बीमा की तरह थी, जिसने उसे आक्रांताओं से बचाए रखा।
बौद्ध धर्म, जिसके पास ऐसा कोई संरक्षण-तंत्र न था, विदेशी आक्रमण के सामने ढह गया।
डॉ. आंबेडकर की अंतिम रचनाएँ कम पढ़ी जाती हैं, पर उनमें उनका प्रौढ़ निष्कर्ष स्पष्ट है।
हिंदू धर्म का विरोध करने वालों का पहला निशाना हमेशा पंडित और पुजारी ही रहे हैं। यह संयोग नहीं है।
सोचिए उस पंडित या पुजारी के बारे में जिसकी आजीविका नाममात्र है, और जो आंधी और तूफान में भी निर्जन से निर्जन मंदिर तक भी पहुँचता है, दीप जलाता है, शंख फूंकता है, घंटा बजाता है और श्लोक पढ़कर देवों को जागृत करता करता है। भले उसे देखने,सुनने वाला वहाँ एक भी भक्त न हो, फिर भी वह पूजा करता है। वही व्यक्ति आपके धर्म का असली सेनानी है।
इसीलिए आपके विरोधी उसी पर आघात करते हैं। वह साधारण, जर्जर धोती में लिपटा गरीब पंडित या पुजारी ही उनके लिए सबसे बड़ा शत्रु है। उसे गिराकर ही वे हिंदू धर्म को गिराना चाहते हैं।
आर के भोपाल।