न्यायपालिका और शब्दों की मर्यादा!
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भारत में न्यायालय केवल कानून का प्रहरी नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का भी स्तंभ है। किंतु जब वही स्तंभ तिरछी छाया डालने लगे तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
खजुराहो में भगवान विष्णु की टूटी प्रतिमा को पुनःस्थापित करने की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी — “कि विष्णु स्वयं करें” — भले ही न्यायिक सीमा स्पष्ट करने के लिए कही गई हो, पर जनमानस में यह धार्मिक कटाक्ष जैसा प्रतीत हुआ। आलोचना इतनी बढ़ी कि मुख्य न्यायाधीश को सफाई देनी पड़ी। दूसरी ओर, मेहरौली की दरगाह और चिल्लगाह के मामले में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को संरक्षण और मरम्मत का आदेश दिया, जबकि ये स्थल अब तक संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल ही नहीं थे।
यहाँ समस्या फैसले से अधिक शब्दों की है। न्यायपालिका से अपेक्षा है कि वह विधि की भाषा बोले, भावनाओं की नहीं। एक ओर “संरक्षण” स्वीकार्य है, दूसरी ओर “पुनःनिर्माण” अस्वीकार्य; यह अंतर कानून की दृष्टि से उचित है, पर आम जनता के लिए यह सीधे “दरगाह बनाम देवता” का समीकरण बन जाता है। यहीं से तनाव उपजता है।
न्यायालय को समझना होगा कि उसका हर शब्द केवल कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है। भाषा में तटस्थता, आदेश में स्पष्टता और प्रस्तुति में संयम ही वह औज़ार हैं जो न्यायपालिका को विश्वास का केन्द्र बनाए रखेंगे। अन्यथा, अनजाने ही, अदालतें उस तनाव की धारा को गति दे सकती हैं जिसे रोकने की जिम्मेदारी उसी पर है।
आर के भोपाल।