बहती धारा और ढलती उम्र!
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कहते हैं—बहती नदी और ढलती उम्र को कोई नहीं रोक सकता।
नदी का जल रुक जाए तो दलदल बन जाता है,और उम्र थम जाए तो जीवन बेमानी।
बहना और ढलना—यही जीवन की चिरंतन लय है।
जवानी का समय ऋतु-वसंत है।
हवा में चंचलता, चेहरे पर आभा,
कदमों में तूफ़ान और आँखों में सपनों का इंद्रधनुष।
हर मंज़िल पास लगती है,
हर राह में उमंग की रुनझुन।
पर धीरे-धीरे समय अपनी छेनी से माथे पर लकीरें खींचता है,
बालों को चाँदी से रंगता है,
कदमों की फुर्ती को ठहराव में बदल देता है।
यही बुढ़ापा है—
जिसे कोई हारा हुआ देखता है,
तो कोई इसे नयी किताब का पहला पन्ना मान लेता है।
क्योंकि उम्र का हर पड़ाव
एक नयी ऋतु है—
बचपन वसंत, जवानी ग्रीष्म,
प्रौढ़ता वर्षा और बुढ़ापा शरद।
शरद में पत्ते झरते ज़रूर हैं,
पर वे मिट्टी में मिलकर
नई हरियाली को जन्म देते हैं।
इसलिए उम्र का ढलना मायूसी नहीं,
बल्कि परिपूर्णता है।
जो इसे मुस्कान से अपनाता है,
वह नदी की तरह अनवरत बहता है।
और जो ठहरकर रोता है,
वह भीतर ही भीतर सूख जाता है।
उम्र का गीत यही है—
हर पड़ाव को उत्सव समझो।
जवानी की चंचलता,
प्रौढ़ता की गहराई,
और बुढ़ापे की शांति—
तीनों मिलकर ही जीवन को
उसकी संपूर्णता देते हैं।
बहती धारा ही सागर से मिलती है,
और ढलती उम्र ही निरंतरता की अनुभूति देती है।
आर के भोपाल।