सोशल मीडिया के मंच पर, जहां एक ओर ज्ञान, कला और जानकारी का सागर उमड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर एक नया ही दृश्य देखने को मिल रहा है। यह दृश्य है रील बनाने का, जहां हमारी 'अच्छे घरों की बहू-बेटियां' भी अपनी नाचने -गाने की कला का प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं। जिसे वे बड़े ही गर्व और जोश के साथ प्रस्तुत करती हैं।
हमारे भारतीय समाज में, जहां 'मर्यादा' और 'परंपरा' को जीवन की नींव माना जाता था, वहां अब इस नई क्रांति ने एक हलचल मचा दी है। रील बनाने का यह शौक, जो कभी गली-मोहल्ले के बच्चों का खेल हुआ करता था, अब हमारे संभ्रांत परिवारों की बेटियों तक पहुंच गया है। पहले, जहां घर की बहू-बेटियों का कर्तव्य घर संभालना, पूजा-पाठ करना और बड़ों का आदर करना था, अब उनका मुख्य कर्तव्य अपने मोबाइल के कैमरे के सामने 'नाचना-गाना' और 'लाइक्स' बटोरना बन गया है।
यह देखकर कभी-कभी मन में एक सवाल उठता है कि क्या ये वही बेटियां हैं, जिन्हें उनके परिवारों ने बड़ी संस्कारों के साथ पाला-पोसा था?
वे बेटियां, जिनके लिए शादी के बाद भी ससुराल वालों की 'नाक' का सवाल हमेशा ऊपर रहता था। अब वही बेटियां, अपने फोन के कैमरे के सामने ऐसे-ऐसे करतब दिखाती हैं, जिन्हें देखकर उनकी दादी, नानी और यहां तक कि उनके माता-पिता को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है।
कुछ लोगों का मानना है कि यह 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' है, तो कुछ कहते हैं कि यह 'पाश्चात्य संस्कृति' का प्रभाव है। लेकिन सच तो यह है कि यह 'ध्यान खींचने' की एक तरीक़ा है, जहां हम अपने आप को साबित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यह सब देखकर ऐसा लगता है जैसे हमारी बेटियां, जो कभी घर की इज्जत थीं, आज खुद ही उसे नीलाम कर रही हैं। यह सिर्फ एक व्यंग्य नहीं, बल्कि हमारे समाज के बदलते स्वरूप का एक कड़वा सच है। इस बदलाव से कई परिवारों की युवा पीढ़ी को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है, लेकिन वे कुछ बोल नहीं पाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करना 'पुराने जमाने' की सोच को दर्शाएगा।
इस नए दौर की बहू-बेटियों के लिए, शायद 'मर्यादा' और 'परंपरा' की परिभाषा बदल गई है। उनके लिए अब 'परंपरा' का मतलब है, रोज नए-नए 'ट्रेंडिंग' गानों पर रील बनाना, और 'मर्यादा' का मतलब है, एक दिन में ज्यादा से ज्यादा 'लाइक्स' और 'फॉलोअर्स' पाना। यह सब देखकर यही लगता है कि अब हमें भी अपनी सोच को बदलना होगा, या फिर इस नई क्रांति को स्वीकार करना होगा, क्योंकि अब हमारी बहू-बेटियों को सिर्फ रसोईघर में नहीं, बल्कि 'सोशल मीडिया' के मंच पर भी महारत हासिल करनी है।
क्या यह बदलाव समाज की बदलती सोच का एक नया पहलू है, या फिर यह हमारी सांस्कृतिक जड़ों से दूरी का एक संकेत है? इस पर आपके क्या विचार हैं?
जरूर लिखें।
आर के भोपाल।