"ख़ल्वत-ए-ज़ीस्त"
ये ख़ल्वत तो शजर-ए-ख़िज़ाँ सी है ज़ीस्त में मेरी,
शायद कोई रफ़ीक़ लिखा ही नहीं क़िस्मत में मेरी।
हर सफ़्हा तन्हाई का आईना बना है आज,
फिर भी चिराग़ रोशन है हिम्मत में मेरी।
ख़्वाबों की ज़मीं पे सदा वीरानी ही उतरी,
ना बहारों का सफ़र, ना कोई रहमत में मेरी।
दस्तकें देती रहीं आहटें हर मोड़-ए-उम्र पे,
मगर खुला ही नहीं दर कोई राहत में मेरी।
क़ाफ़िले आते गए, पर मैं अकेली ही रही,
बस तन्हाई रही मुअय्यन सफ़रत में मेरी।
तेरा नाम ही सजदा था, तेरी याद ही दुआ,
मोहब्बत ही रही दर्ज इबादत में मेरी।
"कीर्ति" ये ग़ज़ल पढ़ के सभी पूछते हैं अक्सर,
क्यों उदासी ही झलकती है हर सूरत में मेरी।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️
ख़ल्वत = तन्हाई, अकेलापन
शजर-ए-ख़िज़ाँ = पतझड़ का पेड़
ज़ीस्त = ज़िन्दगी
रफ़ीक़ = साथी, दोस्त
सफ़्हा = पन्ना
रहमत = दया, करुणा
क़ाफ़िला = भीड़, जत्था
मुअय्यन = निश्चित,
सफ़रत = यात्रा
इबादत = पूजा, उपासना