फुस्सफुसाहट के ठेकेदार!
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आजकल समाज में एक नई यूनिवर्सिटी खुल गई है— फुसफुसाहट विश्वविद्यालय। यहाँ डिग्री नहीं मिलती, सीधे "दिल में आग लगाने का डिप्लोमा" मिलता है। छात्र ज्यादा पढ़ाकू नहीं होते, बस दूसरों के कान तक पहुँचने की कला में पारंगत होते हैं।
इन महाशयों का काम बड़ा आसान है— कहीं भी पहुँचो, धीरे से किसी के कान में फुसफुसा दो:
"भाई, तुमको पता है, तुम्हारे बारे में क्या कहा गया है?"
बस! आग लग गई। अब आप घर जाओ, माथा पकड़ों, रात भर छत ताकते रहो। और वह सज्जन? आराम से खर्राटे ले रहे होंगे।
ऑफिस में बॉस की एक भौं चढ़ी नहीं कि कोई सहकर्मी कान में पिघला हुआ सीसा डाल देगा— “लगता है, अबकी बार प्रमोशन गया।” मोहल्ले में हल्का-सा झगड़ा हुआ नहीं कि आंटी जी कान पकड़ लेंगी— “बेटा, हमने तो सुना है, वो आपके खिलाफ मोहल्ले में मीटिंग कर रहे हैं।”
असल में ये लोग न विवाद में फंसते हैं, न अदालत में गवाही देते हैं, न पंचायत में चेहरा दिखाते हैं। बस कान में बारूद रखकर तिनका जलाने के बाद गायब। और आप? झगड़े में कूद जाइए, रिश्ते बिगाड़िए, खून जलाइए।
इसलिए, अगली बार कोई आपके कान में फुसफुसाए तो मुस्कुराइए और कह दीजिए—
"भाई साहब, ज़रा ज़ोर से बोलिए, ताकि सब सुन लें। आग लगानी है तो खुलकर लगाइए।"
क्योंकि याद रखिए—
फुसफुसाहटें वही लोग करते हैं, जिनकी हिम्मत खुलेआम बोलने में दम तोड़ देती है।
आर के भोपाल।