तलहीन आंखों में
नींद कहां बैठती है?
एक पागल निशाचर
विकल्पों के आखेट पर होता है
छोड़े हुए क्रियाकलापों को
बिन बिन कर संभावनाओं में पिरोता है
उदासी की रातों में कवि
घाव कुरेदता है
कई खण्डहर
कईयों गड्डे
रिक्त चारपाई पर लेटा हुआ सन्नाटा
अपलक अतीत में झांकता है
टूटे हुए दर्पणों में आकाश भी टूटा नज़र आता है . . .
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विक्रम 'एक उद्विग्न'
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( विकल्प - नींद के विकल्प )