बहुत महँगा सौदा!
--------------------+++++
जिंदगी अजीब व्यापारी है। यह हमें अक्सर ऐसे सौदे करवाती है जिनकी कीमत पैसे से नहीं, दिल के टुकड़ों से चुकानी पड़ती है। नौकरी का नाम सुनते ही लगता है मानो सुनहरे सपनों का दरवाज़ा खुल गया हो, पर उस दरवाज़े से गुज़रते वक़्त हम क्या-क्या पीछे छोड़ आते हैं, इसका हिसाब कोई नहीं रखता।
गाँव की कच्ची मिट्टी की खुशबू, छत पर सूखते पापड़, आँगन में खेलते बच्चे, पिता की डांट में छुपा प्यार और माँ की गोद का वह सुकून—सब कुछ धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है। ट्रेन में बैठकर शहर की ओर निकलते हुए लगता है कि मानो अपने ही हिस्से की धूप, अपनी ही हवा और अपनी ही धरती से कोई बिछड़ रहा हो।
नौकरी मिलती है, तनख्वाह भी मिलती है, पर उस तनख्वाह के साथ मन पर एक खालीपन भी थम जाता है। शहर की भीड़ में चेहरों का समंदर है, पर वहाँ अपनापन कहीं खो जाता है। यहाँ सब कुछ है—रोशनी, सुविधाएँ, दौड़ते वाहन, ऊँची इमारतें—पर उस खिड़की से आती आवाज़ नहीं है जिसमें माँ रसोई से पुकारती थी, “खाना खा ले बेटा।”
सच तो यही है कि नौकरी पाना आसान नहीं, पर नौकरी निभाना उससे भी कठिन है। निभानी पड़ती है उस कीमत पर, जिसमें रिश्ते धीरे-धीरे पर्श की तस्वीर बनकर रह जाते हैं। फोन की घंटी पर ही माँ की आवाज़ मिलती है और गाँव की गलियाँ अब सिर्फ़ सपनों में दिखती हैं।
ज़िंदगी का यह सौदा बहुत महँगा है—रोटी, कपड़ा, मकान तो मिल जाता है, पर अपना गाँव, माता-पिता का प्यार, संगी साथी का संगत, घर का सुकून और त्योहारों का उल्लास सब खत्म हो जाता है। शायद यही जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है कि जिस रोज़गार को पाने के लिए हम इतने बेचैन रहते हैं, वही हमें इन सब गहरे अपनेपन से दूर कर देता है।
आर के भोपाल।