असली तानाशाही !
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भारत की राजनीति एक अखाड़ा है जहाँ सच और गप्प बराबरी से पहलवानी लड़ते हैं। 1978 में शरद पवार जब महाराष्ट्र के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने तो सबको लगा—नई पीढ़ी का नया दौर शुरू हुआ। लेकिन राजनीति में "नई पीढ़ी" उतनी अहम नहीं जितनी अहम है दिल्ली दरबार की चौखट पर माथा टेकना।
किस्सागो कहते हैं कि संजय गांधी मुंबई के हवाई चक्कर पर रहते थे। वजह चाहे राजनीति हो या सिनेमा, मगर उस दौर के मुख्यमंत्री हर बार एयरपोर्ट पर खड़े रहते थे, मानो प्रांतीय सरदार नहीं, दरबान हों। शरद पवार ने यह परंपरा तोड़ी। और यही “हिम्मत” उनकी कुर्सी खा गई। कहते हैं, इंदिरा गांधी ने दिल्ली बुलाया, मीठा-सा वार्तालाप हुआ, और जैसे ही पवार जी विमान से मुंबई लौट रहे थे, विविध भारती पर ऐलान हुआ—"महाराष्ट्र सरकार बर्खास्त।" वाह!
लोकतंत्र की मौत का समाचार भी उसी चैनल पर, जहाँ 'बिनाका गीतमाला' बजती थी।
अब जरा आंकड़ों का सच सुनिए। नेहरू ने 7 बार राष्ट्रपति शासन लगाया, इंदिरा गांधी ने 39 बार, राजीव ने 6 बार, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने 11-11 बार। इंदिरा जी तो इतनी बार सरकारें गिराती थीं कि लगता था लोकतंत्र उनके लिए गुड़िया का खेल है—मन हुआ तो सजा दी, मन हुआ तो तोड़ दिया।
और अब आइए "तानाशाही" के उस किरदार पर, जिसे आज की मीडिया और विपक्ष हिटलर कहता है। नरेंद्र मोदी—दस साल हो गए सत्ता में, लेकिन एक भी राज्य सरकार बर्खास्त नहीं। आँकड़े यही कहते हैं। पर मज़ा देखिए, जिनके पुरखे लोकतंत्र को पचास बार आईसीयू में डाल चुके, वही लोग अब चिल्ला रहे हैं कि मोदी तानाशाह है!
सच तो यह है कि असली तानाशाही दिल्ली की वही पाठशाला थी, जहाँ मुख्यमंत्री एयरपोर्ट पर खड़े रहकर दरबारी सेवा बजाते थे। बाकी सब तो आज की राजनीति की गप्पगोष्ठी है।
आर के भोपाल।