बिहार की शराबबंदी और नशे का नया चेहरा!
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2016 में जब बिहार ने शराबबंदी का बिगुल बजाया, तो इसे एक सामाजिक क्रांति का आगाज़ माना गया। सरकार का तर्क था कि शराब परिवारों को तोड़ रही है, हिंसा को जन्म दे रही है और समाज को खोखला कर रही है। प्रतिबंध लागू हुआ और नतीजे भी सामने आए। शराब की खुली बिक्री गायब हो गई, घरेलू कलह कुछ कम हुए और शराब से होने वाले हादसों में गिरावट दर्ज हुई। यह पहल निश्चित ही एक बड़ी उपलब्धि थी।
परंतु हर सिक्के का दूसरा पहलू होता है। शराबबंदी ने शराब को तो कम किया,पर लोग दूसरे नशे की भूख के चपेट में उलझने लगे।
शराब कम हुए,पर नशा बढ़ गया।
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सरकारी आँकड़े और पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि शराबबंदी के बाद ड्रग्स से जुड़े मामलों में चार गुना वृद्धि हुई है।
गांजा और अफीम,
ब्राउन शुगर और हेरोइन,
कोडीन युक्त कफ सिरप,
और अब तो सिंथेटिक नशे भी।
जो लोग पहले शराब की ओर भागते थे, उन्होंने अब इन खतरनाक विकल्पों का सहारा लेना शुरू कर दिया। अस्पतालों और नशामुक्ति केंद्रों की रिपोर्टें भी यही कहानी कहती हैं: शराब-सम्बंधी मरीज घटे, पर ड्रग्स के शिकार तेज़ी से बढ़े।
क्यों हुआ ऐसा?
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नशा मनुष्य की आदत है, उसकी लत है — इसे सिर्फ़ कानून से काटा नहीं जा सकता।
शराबबंदी ने आपूर्ति को बदला, पर माँग जस की तस रही।
शराब की जगह ड्रग्स की अँधेरी बाज़ार फूलने-फलने लगा।
तस्करों ने देखा कि ड्रग्स में मुनाफ़ा ज़्यादा है और जोखिम शराब से कम तो धंधा बदल लिया।
मिले-जुले असर।
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सकारात्मक पक्ष: शराब का सेवन घटा, सड़क दुर्घटनाएँ और घरेलू हिंसा में कमी आई, लेकिन ड्रग्स का ज़हर और गहरा फैल गया। युवा पीढ़ी इसके निशाने पर है। सिंथेटिक नशे ने स्वास्थ्य को कहीं ज़्यादा गंभीर खतरे में डाल दिया है।
नीति की चूक।
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शराबबंदी को केवल कानून का चाबुक समझा गया।
जरुरत अनुसार नशामुक्ति केंद्रों की स्थापना नहीं की गई।
शिक्षा और रोजगार से जोड़ने वाली योजनाएँ कमजोर पड़ीं।
डेटा और निगरानी का तंत्र ढीला रहा।
परिणाम यह हुआ कि शराब तो कम हुई, लेकिन नशे का चेहरा बदलकर और भयावह हो गया!!
आर के भोपाल।