**"मैं सच में बहुत शरीफ़ हूँ,
पर पता नहीं क्यों,
जब कलम हाथ में आती है,
तो कुछ लोगों को मैं बागी लगने लगता हूँ,
कुछ की निगाहों में विद्रोही।
क्या सच लिखना गुनाह है?
क्या जो दिख रहा है, उसे बयान करना अपराध है?
मैं किसी और की आवाज़ क्यों बनूँ,
जब मेरी अपनी आवाज़ ही काफी है।
हाँ, मैं बागी हूँ,
पर गुलाम नहीं।"**