"उम्र-ए-इशरत"
ऐसी नक़बत मेरी क्यों किस्मत हो गई,
जिनसे कुर्बत थी, उन्हीं को मुझसे नफ़रत हो गई।
सबब न पूछो, बस ख़िज़ाँ-सी हो गई हूँ,
फ़क़त ख़ार-ए-चमन से अब निस्बत हो गई।
ज़ख्म, दर्द, अश्क और रुस्वाई इतनी,
ज़िस्त ना रही, बस जलालत हो गई।
हुकूमत-ए-दौर-ए-ज़बाँ दराज़ है अब,
मेरी ज़ुबाँ की ख़ामोशी ही जहालत हो गई।
सब हँस कर सहना मेरी फ़ितरत हो गई,
ये झूठी हँसी ही मेरे चेहरे की ज़ीनत हो गई।
वो नादानियाँ, वो मासूमियत कहीं खो गई "कीर्ति",
हौले-हौले गुज़र, अब उम्र-ए-इशरत हो गई।
Kirti Kashyap "एक शायरा"✍️
नक़बत = दुर्भाग्य
कुर्बत = करीब
सबब = कारण
खिज़ा = पतझड़
फ़क़त = केवल, सिर्फ
ख़ार-ए-चमन = बगीचे का कांटा
निस्बत = लगाव, सम्बन्ध
रुस्वाई = बदनामी, बेइज्जती, अपमान
ज़िस्त = ज़िन्दगी
जलालत = अपमान
जबाँ-दराज = बहुत बोलने वाला, बदज़बान
जहालत = नादानी
ज़ीनत = सजावट
उम्र-ए-इशरत = मौज मस्ती की उम्र