जिंदगी की सच्चाई----
जिंदगी लम्हो में साथ
जिया हमने गांव की
गलियों में बचपन
शरारत के दिन बीते।।
स्कूल गए ना जाने कब
बचपन पीछे छूट गया
युवा यौवन में दुनिदारी
समाज की राह देखे।।
ना जाने कब ऐसे दिन आये
एक दूजे के बिन लम्हा भी
वर्षो जैसा प्यार कहते
इसी को दुनियां ने बतलाते।।
वह भी मेरी चाहत थी
उसका अरमान मैं
हम दोनों के बीच
नही था कोई सीमा
रेखा का बंधन।।
दुनियां को ना जाने
कैसे रास नही आयी
हम दोनों की दुनियां
मोहब्बत की अंगड़ाई।।
लाख कोशिशें दुनियां की
देने को जुदाई दुनियां हारी
जीते हम साथ साथ
श्मसान में सोए हम।।
जाने कितनी रूहे
नीद में खामोश यहां
देख रहा है ईश्वर
अपने बंदों को बैठे
मंदिर मस्जिद चर्च
गुरुद्वारे से मौन।।
दुनियां में जब जागे
जिंदा थे जाने कितने ही
अरमान इरादे थे
कुछ परवान चढ़े
कुछ साथ जले हुए।।
नीद टूटने का इंतजार
जगने जिंदा होने का
इंतज़ार शायद
मील जाए दुनियां में
इंसानी परिवार समाज।।।
सृष्टि में महाप्रलय आएगा
ईश्वर फिर अपना
आदेश सुनाएंगे
जब जागे थे में
चिर निद्रा से अनिभिज्ञ
अंजान।।
शरीर प्राण की खुशियों की
खातिर जाने क्या क्या किया
उपाय खुद ही ईश्वर बन जाते
दुनियां मुठ्ठी में करने की चाह।।
गुजर गए जाने
कितने ही राह
करते स्वंयं ईश्वर
को शर्मसार।।
खामोश पड़े वीरानों में
शरीर जल गल गया
बची नहीं हड्डी
बच गया दुनियां
लम्हो का लेखा जोखा
रूहानी अंदाज़।।
रूहे अंजान नही
अपने जिस्मानी
लम्हो कदमों से
गहरी नींद में भी
बाते करते दुनियां में
अपने जिंदा रहते
क्या खोया
क्या पाया जज्बात।।
नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर