भाग 2 – प्रेम बंधन (अंजाना सा)
(कहानी का अगला भाग)
शिव को इन दिनों अजीब सपने आ रहे थे। हर रात जैसे कोई उसे पुकारता — एक धुंधली सी आवाज़, जो सीधे उसके अंतर्मन में उतर जाती। उसकी नींद टूट जाती, पसीने से तर-बतर, और एक बेचैनी उसका पीछा नहीं छोड़ती। वो उठकर पानी पीता, खिड़की से बाहर अंधेरे में झांकता, और फिर खुद को समझाकर दोबारा सोने की कोशिश करता।
सुबह वही दिनचर्या—उठना, एक्सरसाइज करना, नाश्ता और फिर ऑफिस। वो सब कुछ सामान्य था… सिवाय उसके मन के। वहां कुछ था जो अब सामान्य नहीं रहा था।
वहीं दूसरी ओर...
रीना — एक मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की। उसका जीवन बाहर से साधारण दिखता था, मगर भीतर एक टूटी हुई आत्मा छुपी थी। उसकी ऊँचाई लगभग पाँच फीट, चेहरे पर मासूमियत और आँखों में कहीं गहराई थी — जैसे अनकही कहानियाँ छुपी हों।
उसके परिवार में माँ मधु, पिता किसान और छोटा भाई सत्यंम थे। घर में रीना से ज्यादा किसी की महत्वाकांक्षा नहीं थी। उसे गाने का शौक था, लेकिन उसके परिवार को यह सब “फालतू” लगता था। बार-बार ताने, बार-बार अपमान — धीरे-धीरे रीना ने सपने देखने ही छोड़ दिए।
अब बस रसोई उसका संसार बन गई थी। कोई सपना, कोई इच्छा, कुछ नहीं।
हर दिन मां कहती:
"अब तेरी शादी कर देते हैं, उम्र हो गई है!"
पिता किसान को बस दहेज की चिंता रहती। और भाई सत्यंम भी परिवार की ही तरह सोचने लगा था।
रीना ने अपने बचपन की सबसे प्यारी दोस्त को शादी के बाद मरते देखा था — घरेलू हिंसा की शिकार। उसके ससुराल वालों ने दहेज के लिए जान ले ली थी। तब से रीना ने तय कर लिया था, "शादी नहीं करनी। कोई रिश्ता, जिसमें मेरी आज़ादी छीनी जाए, मुझे मंज़ूर नहीं।"
अब वो बस चुपचाप सुनती है — ताने, बातें, अपमान — सब कुछ। लेकिन जवाब नहीं देती। क्योंकि उसे पता है, "इस घर में कोई समझने वाला नहीं है।।