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🔱 धूमावती — वैराग्य की देवी
बिना किसी पुरुष की, पूरन पहचान है,
विधवा नहीं, वो तो आत्मसम्मान है।
न साज, न श्रृंगार, न कोई मोह का बंधन,
वैराग्य की प्रकृति, धूमावती का जीवन।
झुर्रियों में छिपा अनुभवों का प्रकाश,
हर त्याग में बसी है आत्मा की तलाश।
धुएँ-सी वह छवि, पर रोशनी से भरी,
मोह से परे, मगर ज्ञान से जुड़ी।
ना ममता की मूरत, ना क्रोध की आग है,
परित्याग में छुपा उनका अनुराग है।
कौवे की सवारी, श्मशान का वास,
बताती है — जीवन में भी है नाश का स्वाद।
पर वो डर नहीं, वो अंत नहीं,
वो तो शुरुआत है — आत्मा की सही।
माया के परे, इच्छाओं से मुक्त,
धूमावती है चेतना की शक्ति, पूर्ण युक्त।
वो जो अकेली, पर अपूर्ण नहीं,
वो जो त्यागी, पर निर्बल नहीं।
वो जो वृद्धा, पर समय से आगे,
वो जो नीरस, पर शून्य के भाग्य जागे।
धूमावती — तू है अंधेरे की रोशनी,
त्याग की मूरत, तप की छवि।
ना चाहिए सिंगार, ना चाहिए रंग,
तेरी मुस्कान में है वैराग्य का संग।