"मै सुनिता हु"
(एक नाम एक आत्मा )
मै सुनिता हु....
ना सिर्फ नाम की मिठास में लिपटी
बल्कि उस नीति की मुस्कान हुं
जो चुपचाप दुनिया को शान्ति सीखा देती हैं।
मैं "सु" हु..
हर अच्छे भाव की पहली किरण
जो टूटे हुए शब्दों को भी
प्रेम की भाषा सीखा देती हैं।
मैं "नीता" भी हु..
सही राहो की संगिनी
जो मन की उलझनों में
कभी राधा सी मौन बन जाती हैं
तो कभी मीरा सी रो उठती हैं...
पर पथ से नहीं डगमगाती।
मैं "सुनिता" हु
मधुरता में बसी वो स्त्री
जिसके मौन में कृष्ण भी खुद को ढूंढते हैं
और जिसकी आंखों से गिरा एक आंसू
गीत बन जाता हैं...
मैं "सुनिता" हु....
। सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि वो भाव हु
जो जब भी लिखा जाए...
बांसुरी की तरह बज उठे।
(यही हु मैं...
शब्दों में, मौन में,
और इस यात्रा की
पहली साथ में)