Hindi Quote in Poem by Biru Rajkumar

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यह पंक्ति बहुत ही सुंदर और गहराई से भरी हुई है। इसमें माँ काली को "मूर्ति" नहीं, बल्कि "प्रकृति" की तरह देखने की बात कही गई है — जो निरंतर परिवर्तनशील, जीवंत और व्यापक है।

यहाँ इस भाव को आगे बढ़ाते हुए पूरी कविता इस तरह हो सकती है:


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काली, मैं तुझे प्रकृति की तरह देखती हूँ
ना कि पत्थर की एक मूर्ति की तरह,
तू बहती है नदियों सी, गरजती है बादलों सी,
हर आँधी, हर ज्वाला में तेरा ही रूप दिखता है।

तू धरती है — धैर्य और सहनशीलता की मिसाल,
तू अग्नि है — जो अन्याय को भस्म कर दे बेहिचक।
तेरी आँखों में झलकता है सृष्टि का हर रंग,
तू जन्म भी है, तू संहार भी — यही है तेरा संग।

मंदिर की चौखट में नहीं बाँध सकती तुझको,
तू तो है हर कण में, हर कली, हर आँधी में,
मैं तुझे देखती हूँ हर माँ की ममता में,
हर स्त्री की शक्ति में, हर बच्ची की मुस्कान में।

मैं जब डरती हूँ, तू बन जाती है मेरा हौसला,
जब थकती हूँ, तू बनती है मेरा सहारा।
तू केवल पूज्य नहीं, तू प्रेरणा है, चेतना है,
तू ही मैं हूँ, और मैं ही तू — यही है सच्ची साधना।


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Hindi Poem by Biru Rajkumar : 111985527
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