ज़रा सी भी फुर्सत मिलने पे,
दिल ही दिल तुझे याद किया।
अपने दिल की तंग गली को,
विशाल होकर आबाद किया।
मन के तम को ज्ञानदीप से हर,
सुकून रूहान से शाद किया।
सुकूं से शांत हुआ तप्त मन,
दूर कलह–क्लेश विवाद किया।
रंग–बिरंगे फूल फिज़ा महकाए,
पशु–परिंदों को आज़ाद किया।
तीन लोक नवखण्ड माया को,
नाच नचाता है जो रब ‘’।
सृजनहार किया रूबरू मुर्शद ने,
इक पल में विस्माद किया।