क्या हो अगर पसंदीदा इंसान पसंद ही ना रहे
हार जाती है संवेदनाएं
चटक जाते है ख़्वाब
कुछ फीकी हो जाती है वेदनाएं
शिथिल हो जाती है रक्त वाहिनियां
सुख जाता है हृदय तक पहुंचने वाला रक्त
कांपने लगती है अंगुलियां
जर्द हो जाती है चेहरे की लालिमा
संवाद करने लगती है खुद से ठिठुरती सांसे
मोहभंग ले चलता है चित्त को दुनियां से दूर
निस्तेज धड़कने और धुंधलाती दृष्टि करती है आपस में मंत्रणाएं
और अंत में जब पसंदीदा इंसान पसंद न रहे
तो यादों की राख से कोई ताप नहीं उठता
आइने में अपना अजनबी-पन खलने लगता है
स्मृतियों की जर्जर पोटली में हो जाते है सुरा़ख
कई मर्तबा सांसे सिर्फ अस्तित्व जताने भर को चलती है
और चलती है जैसे किसी पुराने राग की हो अंतिम तान
ArUu ✍️