"मैं कर दिखाऊंगी"
सब कहते थे —
"ये तेरे बस की बात नहीं..."
कभी हंसते थे,
कभी नज़रें चुराते थे।
पर वो चुप रही,
सिर्फ मुस्कुराई...
क्योंकि वो जानती थी —
अब जवाब शब्दों से नहीं,
कर्मों से देना है।
रातों को जागकर,
जब बाकी सोते थे,
वो अपने सपनों को सीती थी,
हर चोट पर खुद को सींचती थी।
उसे फर्क नहीं पड़ता अब —
कौन क्या कहता है,
क्योंकि अब वो खुद से एक वादा कर चुकी है:
"जब तक खुद पे भरोसा है,
दुनिया की आवाज़ें बस शोर हैं।"
वो बस चलती रही…
कभी धीरे, कभी तेज़
कभी टूटी… तो खुद ही जुड़ी
पर रुकी नहीं।
आज भी लड़ रही है —
दुनिया से नहीं,
खुद की पुरानी सोच से।
क्योंकि उसे पता है —
"कहानी तब बनती है,
जब कोई लड़की…
खुद को चुनती है।"