गाँव की माटी – चनचढ़ा की कहानी
(लेखक: रतिक बेहरा)
जब सूरज पूरब से झाँकता, माटी महक उठती है,
मेरा गाँव चनचढ़ा तब, नयी उमंग में बहक उठती है।
नदियों का मीठा कलरव, मंदिरों की आरती,
हर सुबह पंछियों संग, गूँजती शुभ भारती।
तालाब के निर्मल जल में, बचपन की परछाईं,
छप-छप कर नहाते बच्चे, यादों की गहराई।
पीपल की छाँव तले, बूढ़े कहते कहानियाँ,
राजा-रानी, युद्ध-गाथा, वीरों की निशानियाँ।
मंदिरों में बजते शंख, मन को शांति देते,
शिव की छवि निहार के, सारे दुख क्षण में जाते।
पहाड़ों की चोटी से, जब देखूँ अपने गाँव को,
हरियाली की चादर ओढ़े, लगता जैसे स्वर्ग को।
आम के बगीचे में, जब आम पकने लगते,
मीठे रस में भीगकर, बचपन लौटने लगते।
गाँव की गलियों में, मिट्टी की सोंधी खुशबू,
हर घर में बसी हुई, अपनापन की महकू।
पर अब बदल रहा सब, शहर की छाया है,
कहीं खो ना जाए मेरा गाँव, यही बस डराया है।
पर मेरी साँसों तक, ये माटी मेरी रहेगी,
चनचढ़ा की यादें, हर लफ्ज़ में बहेंगी।