ख़त जो कभी भेजा नहीं
रात का सन्नाटा था, खिड़की से चाँदनी कमरे में उतर रही थी। माया ने पुरानी किताब के बीच से एक ख़त निकाला, जिसकी स्याही अब हल्की पड़ने लगी थी। यह ख़त उसने दो साल पहले आरव के लिए लिखा था, मगर कभी भेजा नहीं।
आरव… वो शख्स जो उसकी ज़िंदगी में अचानक आया और एक खूबसूरत अधूरी कहानी की तरह छोड़कर चला गया। वे कॉलेज में मिले थे। घंटों बातें करना, लाइब्रेरी में चुपके से एक-दूसरे को देखना, बारिश में भीगते हुए कॉफ़ी पीना—सब कुछ किसी खूबसूरत फिल्म जैसा था।
लेकिन किस्मत ने अलग फैसला कर रखा था। आरव को अपने परिवार के साथ विदेश जाना पड़ा। दोनों ने वादा किया था कि मिलते रहेंगे, मगर वक्त ने दूरियाँ बढ़ा दीं।
माया ने उस रात आरव को यह ख़त लिखकर सब कह देना चाहा था—"तुम्हारे बिना सब अधूरा लगता है, आरव। तुम्हारी हँसी, तुम्हारी बातें, यहाँ तक कि वो अनसुने गाने भी जो तुम गुनगुनाया करते थे।" लेकिन ख़त कभी भेजा नहीं।
आज, इतने सालों बाद, जब उसने आरव की शादी की खबर सुनी, तो उसकी आँखों में नमी थी। उसने मुस्कुराते हुए वह ख़त मोड़ा और मोमबत्ती की लौ में जला दिया।
कुछ ख़त सिर्फ लिखे जाते हैं, भेजे नहीं जाते… और कुछ प्यार सिर्फ महसूस किए जाते हैं, मुकम्मल नहीं होते।