सात्विक प्रेम
प्रेम न कोई सौदा होता, न ही कोई बंधन होता,
यह तो आत्मा की गहराई से उपजा पावन चंदन होता।
न कोई चाहत पाने की, न कोई स्वार्थ छिपा इसमें,
बस देने की तृष्णा रहती, सच्चे भाव बसा इसमें।
संग न हो तो भी दिल में उसकी मूरत बसी रहती,
विरह की अग्नि में भी यह शीतल जल सी बहती।
न कोई छल, न कोई धोखा, न कोई लालच मन में,
बस उसकी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी, उसके हर सपने में।
सात्विक प्रेम वही होता जो आत्मा से जुड़ जाए,
जिसमें तन की आस न हो, बस मन निर्मल रह जाए।
जो प्रेम बिना शर्त के हो, वही प्रेम सच्चा होता,
जिसमें सिर्फ समर्पण हो, वही प्रेम अक्षय होता।