आम आदमी की स्थिति
मैं हूँ आम आदमी,
न रथ है, न सिंहासन।
मैं चलता हूँ पगडंडियों पर,
जहाँ रास्ते खत्म हो जाते हैं
और सपने धुंधला जाते हैं।
मेरे हाथ में न तख्त है, न ताज,
बस एक झोला है,
जिसमें रोटियाँ और उम्मीदें हैं।
मेरी पहचान न किसी किताब में है,
न किसी इतिहास में,
पर हर गली, हर मोड़ पर
मेरे कदमों के निशान हैं।
मैं हर दिन जीता हूँ
एक नई जंग।
महंगाई की मार,
भ्रष्टाचार का भार,
और अपनी उम्मीदों को बचाने की फिक्र।
फिर भी मुस्कुराता हूँ,
क्योंकि हारा नहीं हूँ।
मैं वही हूँ
जो खेतों में हल चलाता है,
पर भूखा सोता है।
वही हूँ
जो ईंटों से शहर बनाता है,
पर झोपड़ी में रहता है।
मैं वही हूँ
जिसकी मेहनत पर
दुनिया चलती है,
पर जिसका नाम
कोई नहीं पूछता।
मेरे सपने बड़े नहीं हैं—
बस बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखना,
घर के आंगन में सुकून पाना।
लेकिन इन छोटे सपनों को भी
हर दिन कुचला जाता है
कभी किसी कानून के नीचे,
कभी किसी वादे के नीचे।
आम आदमी हूँ,
पर मेरी आवाज़ में ताकत है।
जब मेरी सहनशक्ति की सीमा टूटती है,
तो बदलाव की गूंज उठती है।
इतिहास गवाह है,
हर क्रांति का बीज मैं ही हूँ।
मैं आज भी लड़ रहा हूँ,
अपने लिए,
अपने बच्चों के लिए,
और उस भविष्य के लिए,
जहाँ आम आदमी का
सपना भी खास होगा।